कविता

मन का पन्ना

 

मन की किताब का
कोई एक पन्ना रोज खुलकर
पहुंचा देता है इंसान को
भूली बिसरी
यादों में
कुछ होती हैं जिसमें यादगार
सुनहरे पलों की
कुछ होती दर्द भरे दिनों की
उन यादों को पकड़ कर क्या करना
स्वप्न था
रात बीती
स्मृति पटल से उतर गया
किताब का एक पन्ना नया लिखते हैं
जो खुशबुओं से सरोबार हो
खुशगुवार हो
जहाँ ग़म भी न हो, आँसू भी न हो
बस प्यार ही प्यार पले

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020