कविता

दीपमाला

अमावस्या वाली काली रातों में बिछी दीपों की माला है..
अयोध्या नगरी की जगमगाहट दर्शाती हर सवेरा नई उमंगों वाला है
भक्ति की शक्ति देख राजा की
प्रजा में जन-जन हर्षाता है
हनुमत सा बन अनुयाई योगी
आशाओं की बयार बहाता है
द्वारे द्वारे दीप जले हैं
रोशन है हिंदू का तन मन,
नभ जल थल का कण-कण बनाता भारत को एक सुगंधित चमन
दीपमाला की इस कतार में आओ हम भी अपना-अपना दीप जलाएं
हम सब अपना कर्तव्य निभाएं
एक नया भारत बनाएं,
एक नया इतिहास रचायें!

— अशोक गुप्ता

अशोक गुप्ता

साहिबाबाद निवासी, आटे-अनाज के व्यापारी, मंचों पर कवितायेँ भी पढ़ते हैं.