सामाजिक

सिंगल पैरेंट हैं ..तो क्या गम है

प्रकृति की सबसे खूबसूरत कृति की अगर बात की जाए तो, जहन में सबसे पहले जो नाम उभरकर आता है वह है मनुष्य।मनुष्य ही भगवान द्वारा बनाई गई सबसे बेहतरीन रचना मानी गई है । यूं तो ईश्वर द्वारा रची हुई प्रत्येक चीज अपने आप में बेहतरीन और बेमिसाल होती है ,किंतु कुछ ख़ास विशेषताओं और गुणों के आधार पर मनुष्य जाति को प्रभु की सर्वश्रेष्ठ कृति का खिताब दिया जाता रहा है।
नर और नारी दोनों मिलकर सृष्टि को आगे बढ़ाते हैं और ईश्वर द्वारा रची गई इस सुंदर सृष्टि को और भी अधिक खूबसूरत बनाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ईश्वर ने समस्त ब्रह्मांड को रचा और फिर इसे आगे बढ़ाने का कार्य नर और नारी को सौंप दिया।यह सत्य है कि नर और नारी एक दूसरे के पूरक हैं ,दोनों ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण होते हैं ।दोनों में से किसी भी एक की अनुपस्थिति में सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती ।नर और नारी को ईश्वर ने बनाया ही इस प्रकार है कि वे मिलकर ही एक दूसरे को पूरा करते हैं और तभी दुनिया आगे बढ़ती है। दोनों में कभी किसी प्रकार की कोई प्रतिस्पर्धा हो ही नहीं सकती, अर्थात दोनों ही एक साथ मिलकर सृष्टि को चलाने का कार्य करते हैं ।दोनों आपसी प्रेम,संपर्क,समझ,संबंध सामंजस्य एवं समन्वय के साथ अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते हैं और मिलकर इस संसार को चलाते हैं।
किंतु कभी-कभी किसी एक के जीवन में ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है कि उसे अपने जीवन साथी का जीवन की अंतिम सांस तक साथ न मिले ।जीवनसाथी में से किसी एक का असमय साथ छोड़ जाना और प्रभु चरणों में स्थान ले लेना निसंदेह अति पीड़ादायक साबित होता है ।उस पीड़ा की कल्पना भी नहीं की जा सकती ।किंतु समय और होनी बहुत बलवान होती है जिसके समक्ष सभी को नतमस्तक होना पड़ता है। ईश्वर की मर्जी के खिलाफ़ तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ,यह सत्य है।जीवनसाथी में से एक के चले जाने पर दूसरा काफी अकेलापन महसूस करता है और अकेला ही सारी जिम्मेदारियों को उठाता है। किंतु किसी के चले जाने से जीवन कभी रुका नहीं करता।जाने वाले के साथ चाहते हुए भी नहीं जाया जाता।
अक्सर समाज में लोगों की सोच होती है कि सिंगल पैरंट अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी नहीं निभा सकता और उसका परिवार बिखरने लगता है क्योंकि जिन दायित्वों को निभाने के लिए सृष्टि में नर और नारी दोनों को बनाया गया है ,अकेला नर अथवा अकेले नारी उन जिम्मेदारियों को नहीं निभा सकती हैं। किंतु समाज में ही ऐसे बहुत से उदाहरण हम सभी के सामने अक्सर आते हैं जब हम इस सोच को बदलता हुआ देखते हैं।जाने वाले को तो सिंगल पैरंट नहीं रोक पाते,किंतु उसके साथ बिताए हुए सुखद पलों एवम मधुर स्मृतियों को वे तमाम उम्र अपनी ताकत बनाकर जीते हैं और अपनी सभी प्रकार की सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हैं। यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि जिंदगी के जिन दायित्वों को दो लोग मिलकर उठाते हैं वही जिम्मेदारियां जब एक को अकेले निभानी पड़ जाए तो थोड़ी कठिनाई अवश्य होती है ,किंतु यह किसी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अकेला रह जाने पर व्यक्ति उन जिम्मेदारियों को बेमन से एवं कुशलतापूर्वक नहीं निभा पाएगा। किसी की कार्यकुशलता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।
पति और पत्नी दोनों में से किसी एक के चले जाने के बाद कुछ लोग अपनी जिंदगी को दूसरा मौका देते हैं और नया जीवन साथी तलाशते है जिसमें कोई बुराई भी नहीं है।कहा जाता है कि जिंदगी का सफर तनहा अकेले काटना दुष्कर होता है। ऐसे में यदि जिंदगी किसी अच्छे और समझदार व्यक्ति को एक बार फिर आप से रूबरू कराती है तो इसे ईश्वर की इच्छा मानकर सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए।
इन सभी बातों के बीच में यदि किसी के भी मस्तिष्क में यह बात आती है कि सिंगल पैरंट होना जीवन की गाड़ी को ब्रेक लगा देता है तो यह गलत होगा सिंगल पैरंट को भी अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने का हक है ।यदि वह चाहे तो अपनी मर्जी और इच्छा के हिसाब से अपने लिए नया जीवन साथी चुन सकता है। वही यह बात भी मानने वाली है कि यदि वह स्वयं को सशक्त और सक्षम महसूस करता है कि वह अपने सभी जिम्मेदारियों को अकेले रहकर भी बखूबी निभा सकता है तो उस पर किसी प्रकार की जोर जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए और न ही उसे दोबारा किसी नए बंधन में बंधने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए ।इस प्रकार के दबाव में वह खुद को और भी अधिक परेशान और मजबूर महसूस करता है। जीवनसाथी को खोने का शायद उसे उतना दुख नहीं होता होगा जितना उसके जाने के बाद परिवार जनों एवं समाज के लोगों द्वारा उस पर पल पल दबाव बनाया जाना और हर छोटी बड़ी बात के लिए सुनाना,मजबूर करना, ताने देना और यह अहसास कराना कि वह अकेला है अथवा अकेली है।
दोनों में से किसी एक के चले जाने के बाद समाज और परिवार दोनों की ही जिम्मेदारी बनती है कि ऐसी स्थिति में सिंगल पैरंट का साथ दें एवं उन सभी चीजों से बचें जिनसे उन्हें दुख और तकलीफ का सामना करना पड़ सकता है ।
जाह्नवी के स्कूल में ही पढ़ाने वाली एक अध्यापिका प्रिशा ने कोरोना काल में अपने पति को खो दिया और उनके जाने के बाद 5वर्षीय जुड़वां बच्चों के लालन पालन और पढ़ाने लिखाने की जिम्मेदारी प्रिशा पर आ पड़ी। समर्थ के जाने के बाद प्रिशा ने अपने बच्चों को देखकर अपने आप को संभाला और अपने आप से वादा किया कि वह अपने बच्चों को अकेला बड़ा करेगी,पढ़ाएगी लिखाएगी और उन्हें इसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने देगी। अब तक दूर रह रहे सास ससुर अब प्रिशा के साथ ही रहने आ गए।किंतु उन्हें उस का बच्चों को अधिक लाड प्यार देना पसंद नहीं आता था ।उनके अनुसार अधिक लाड प्यार देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। दादा-दादी खुद कभी बच्चों के लिए कोई चीज बाजार से खरीद कर नहीं देते थे, अपितु,स्कूल से घर लौटते वक्त प्रिशा भी जब भी कोई उपहार अथवा सामान बच्चों के लिए लेकर जाती तो सास ससुर से उसे बहुत कुछ सुनने को मिलता जिसे सुनकर वह अंदर ही अंदर बहुत रोती और समर्थ को याद करती। सास ससुर के आने के बाद जहां प्रिशा को उनसे अपार स्नेह,सहारा और समर्थन मिलना चाहिए था वही उनकी उपस्थिति उसके लिए दुख एवम तनाव का कारण बनती जा रही थी ।किंतु उसने अपने मुंह से कभी एक शब्द तक नहीं निकाला और सब्र का घूंट पीने का निर्णय लिया क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि घर में कहासुनी हो जिसका असर आगे उसके बच्चों पर भी पड़े।
किंतु ,यही छोटी पर महत्त्वपूर्ण बात यदि आज के परिवारजन भी समझें, तो शायद अकेले सभी जिम्मेदारियों को उठाने वाले सिंगल पैरंट को इतनी परेशानियों का सामना कभी न करना पड़े जितना उन्हें अक्सर तब करना पड़ता है जब वे जीवनसाथी को खोने के साथ-साथ अपने परिवार और समाज के लोगों की उनके लिए संवेदनाएं, भरोसा और प्यार भी खो बैठते हैं।
स्मरण रहे ,सिंगल पैरंट अकेला हो सकता है …किंतु मजबूर भी हो ,यह बिलकुल जरूरी नहीं।
— पिंकी सिंघल

पिंकी सिंघल

अध्यापिका शालीमार बाग दिल्ली