वक्त का क्या भरोसा
पूर्व निश्चित है आदमी का जीवन मरण
आदमी पैदा होता है मर जाता है
उतना समय ही यहां रहता है
जितना इस जगत से नाता है
सबको अपनी अपनी पड़ी है
काम निकल जाए आंख दिखाता है
कितना मतलबी हो गया खुदगर्ज
इंसान की मज़बूरियां नहीं समझ पाता है
किसी से क्या लेना देना है
मतलब की यह दुनियाँ सारी
पथभ्रष्ट हो गया सुनता नहीं
उसकी मति गई है मारी
अभी में तू जी ले पल में क्या हो जाएगा
वक्त का क्या भरोसा समझ नहीं पायेगा
समय का चक्र चलता रहता है लगातार
नहीं पता किसको लाएगा किस को उठाएगा
— रवींद्र कुमार शर्मा
