लघुकथा

जीने की वजह मिल गयी !

जब जेबें भरी हो, भारी हो, सब रिश्ते-नाते सुहाने, मन भाये लगते हैं। दूर-दूर से रिश्तेदार मिलने आ जाते हैं। कौन अपना, कौन पराया, समझ तब आता हैं, जब कोई दुर्घटना घटित होने से आप की तिजोरी खाली हो जाती हैं।

सोते-सोते ऊब गयी थी विद्या। उसने अतीत में झांक कर देखा, कितने प्यार से मिलने आते थे सब। ऐसे लगता जैसे रोज ही उत्सव मन रहा हो। उत्साह और आनंद से लबालब था जीवन। 

पर जब से अर्धांग वायु से पीड़ित वह विकलांग हुई हैं, जीवन कितना बदरंग हो गया हैं। अपनी मेहनत, लगन से हासिल किया मुकाम खोखला नजर आ रहा हैं। काश, समय पर अपनी दवाइयां ले लेती, यह मुसीबत तो न आती। इलाज के नाम पर पैसा पानी की तरह बहा, पर हाथ कुछ न लगा। अपाहिज, परावलंबी जीवन से ऊब गयी है। चाहती है, मौत आ जाये। पता नहीं, कौन से भोग भोग रही हूं। मौत भी तो मांगने से नही आती।

विमली उसकी पुरानी कामवाली बाई हैं। संगी, साथी, सखी सबकुछ अब वहीं हैं। उसका पूरा ध्यान रखती हैं। न कोई रिश्तेदार, न उससे खून का रिश्ता हैं। कैसा यह बंधन हैं, वह उसकी ओर खींची चली जाती हैं। आज उसका ही सहारा है। वही हैं जो दिन रात उसे संबल देती है। अब दोनों में मित्रता का नाता जुड़ चूका है। एक दूजे से खुलकर मन की बातें हो रहीं हैं।

विमली की दो बेटियां हैं। वो खुद पढ़ नहीं पायी, लेकिन अपनी लाड़ली बिटिया को पढाना चाहती हैं। रिद्धि, सिद्धि को विद्या पढाने लगी। पढ़ाते-पढ़ाते मन उत्साहित हो रहा था। आसपास के और बच्चें आने लगे। प्रेम से, खेल खेल में बच्चें पढ़ने लगे। नतीजे आशानुरूप आने लगे। अब विद्या का मन हर्षविभोर, आह्लादित हो रहा था। अपने विद्यार्थियों की सफलता से उसका आत्मसम्मान बढ़ गया था।

गरीब, अनाथ बच्चों से विद्या फ़ीस नहीं लेती थी। सामाजिक दायित्व निभाते हॄदय पुलकित होता था। 

वह बहुत खुश थी । उसकी अपनी “विद्या निकेतन” अकादमी सफलता के आयाम छूती प्रगति के नए अध्याय लिख रही हैं। जीवन का उद्देश्य सफल होता नजर आ रहा है। बच्चों ने उसके सपनों में  नये रंग भर दिये हैं। जीने की वजह मिल गयी है उसे। 

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*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८