कविता

असमय की एक कविता 

आजकल एकदम खाली हूँ 

इतना खाली कि मेरे हिस्से 

कोई काम ही नहीं बचा,

कभी समय मुझ पर हँसता है 

कभी मैं समय पर 

और यह भी क्या इत्तेफाक़ है 

मेरा समय सापेक्ष होना 

मुझे निरपेक्षता का सिद्धान्त समझा रहा है 

वैसे न समय मेरे साथ है और 

न ही मैं ही समय के साथ 

जो लोग समय की रट लगा 

दुहाई देते थे 

अब पास नहीं फटकते,

मौत का खौफ कभी रहा नहीं

आज भी नहीं है लेकिन 

मैंने देखा है करीब से मौत को 

एक नहीं, तीन-तीन बार 

लोगों ने कहा कि मृत्यु ही सत्य है 

लेकिन सत्य तो जीवन ही है 

ऐसा न होता तो सब 

जीने को लालायित न होते

हाँ, आज मैं महसूस कर रहा हूँ 

मौत को भी उतने ही करीब से 

जीतने करीब से जीवन को देखा

मेरी बैशाखी की टक-टक की आवाज 

करीब आती मौत का बुलावा है  

मौत ने बना लिया है एक ओरा

मेरे इर्द-गिर्द,

कहते हैं- सात ऊर्जा स्तर है 

जो मेरुदंड के गिर्द ऊर्जा चक्र की तरह 

रहते हुए सुरक्षारत हैं 

ये इंद्र्धानुषी रंगों से शुद्ध और चमकदार बन 

स्वस्थ रखते तो कभी 

चमकविहीन हो करते बीमार भी 

अगर ऐसा है तो 

फिर इंतजार किया जा सकता है 

एक बार फिर से मौत का 

चेहरा, पीठ, जुबान सब कुछ ही तो अब 

समय की छाप दिखा 

चिढ़ा रहे हैं पल-पल 

मौत से पहले कुछ काम कर लेना चाहता हूँ 

इस खाली समय में 

कब से गाँव नहीं गया 

बचपन के दोस्त, खेल, प्रेम, झगड़ा 

सब पर सोचने का ये माकूल वक़्त है

बहुत से हिसाब-किताब हैं जो अब 

चुकता कर लेने चाहिए,

एक इच्छा थी कि जब कभी 

खाली समय होगा 

दिन भर मदिरा पान करूंगा 

वक़्त है लेकिन प्याला नसीब कहाँ 

साकी और हमप्याला भी नहीं कोई,

एक अरसा हुआ जब खरीदी थी कुछ और किताबें 

बंडल पड़ा है लाइब्रेरी की किसी दराज में 

सोचता हूँ- उन्हें निकाल सजा दूँ हर सफ़े में 

ट्रोफियों पर भी तो जम गया है 

धूल का एक पूरा अम्बार

जिन पर लिखी उपलब्धियां अब पढ़ नहीं पाता  

खाली समय में मौत का इंतज़ार करना 

कितना असहज कर रहा

ज़िंदगी के बेतरतीब पन्ने खुल रहे हैं  

 मैं पढ़ लेना चाहता हूँ हर वो पन्ना 

जिसे पढ़ने का वक़्त ही नहीं मिला कभी, 

कुछ दोस्त जो छोड़ गए हैं साथ 

उनको याद कर लेना या फिर 

उस व्यक्ति पर दया दिखाना 

जिसकी बीवी छोड़ गयी 

चार बच्चों को उसके भरोसे, 

पानी का घड़ा भी तो बदलना है 

जो पिछली गर्मी में भी रिस रहा था 

टपकती छत की मरम्मत भी लाजिमी है 

बूढ़े हो चुके पिता का 

हाल भी तो नहीं पूछा एक अरसे से 

उनकी दवा का पर्चा भी चिढ़ाता है, 

बचपन की सहेली का हाल-समाचार भी जानना है, 

मौत से पहले का समय 

अचानक कितना अहम लगने लगा है 

मैं इसका भरपूर उपयोग कर लेना चाहता हूँ ।

— सन्दीप तोमर 

संदीप तोमर

जन्म : 7 जून 1975 जन्म स्थान: खतौली, जिला- मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) शिक्षा: एम एस सी (गणित), एम ए (समाजशास्त्र, भूगोल), एम फिल (शिक्षाशास्त्र) सम्प्रति : अध्यापन साहित्य: सच के आस पास(कविता संग्रह 2003), शब्दशिल्पी प्रकाशन, मौजपुर, दिल्ली टुकड़ा टुकड़ा परछाई(कहानी संग्रह 2005), नवोदित प्रकाशन, निहाल बिहार, दिल्ली शिक्षा और समाज (आलेखों का संग्रह 2010), निहाल पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन, गोकलपुरी, दिल्ली महक अभी बाकी है (संपादन, कविता संकलन 2016), मुरली प्रकाशन, दिल्ली थ्री गर्लफ्रेंड्स (उपन्यास 2017), वीएल मिडिया सलूशन, उत्तम नगर, दिल्ली एक अपाहिज की डायरी (आत्मकथा 2018), निहाल पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन, गोकलपुरी, दिल्ली यंगर्स लव (कहानी संग्रह 2019), किताबगंज प्रकाशन, गंगानगर, राजस्थान समय पर दस्तक (लघुकथा संग्रह 2020), इंडिया नेटबुक, नॉएडा एस फ़ॉर सिद्धि (उपन्यास 2021), डायमण्ड बुक्स, दिल्ली कुछ आँसू, कुछ मुस्कानें (यात्रा- अन्तर्यात्रा की स्मृतियों का अनुपम शब्दांकन, 2021) इंडिया नेटबुक, नॉएडा दीपशिखा (उपन्यास, 2023) अद्विक प्रकाशन, दिल्ली परम ज्योति (काव्य संग्रह , 2023) हर्ष पब्लिकेशन्स, दिल्ली सुकून की तलाश में (काव्य संग्रह , 2023) हर्ष पब्लिकेशन्स, दिल्ली