ताकत नहीं चलेगी पड़ेगी मुंह की खानी
क्यों हो रहा विनाश हर जगह
सब जानते हैं पर हैं खामोश
नियमों को रखते हैं ताक पर
सत्ता के नशे में होकर मदहोश
लोगों को ज़िन्दगी से कर रहे खिलवाड़
विकास के नाम पर खोद दिए पहाड़
सत्ता की राजनीति हर जगह सर्वोपरि
आगाह कर रही प्रकृति मार कर दहाड़
सोचिये जरा कौन है वह हत्यारा
जो विनाश के विकास का है जिम्मेवार
ज़िंदगियाँ लील ली जिसने अपनी चालों से
सन्नाटा पसरा है वहां जहां कभी होती थी बहार
पकड़ में कैसे आएगा चलता है हमेशा शकुनि चाल
आएगा एक दिन जब होगा शकुनि जैसा हाल
वातानुकूलित कमरे में बैठकर बनती हैं नीतियां
बाहर जाकर देखोगे हकीकत खुल जायेगा कपाल
अपनी गलती दूसरों पर थोपने में है महान
अपनी नहीं मानेगा दोष देगा प्रकृति को यह मूर्ख इंसान
छः छः मंजिले बना दी वहां जहां
बन नहीं सकता था एक छोटा मकान
नालों पर कर लिया कब्जा कहाँ जाए पानी
पेट नहीं भरता फिर भी थोड़ी है ज़िंदगानी
सुरक्षा मानकों का जब नहीं रखोगे कभी ध्यान
वहां ताकत नहीं चलेगी पड़ेगी मुंह की खानी
— रवींद्र कुमार शर्मा
