गीत/नवगीत

मेरे आंगन में

घटायें साजिश कर रहीं मेरे आंगन में,
बारिश रह-रह बरस रही मेरे आँगन में।
बिजली की चमक तन-मन थरथराहट,
बड़ी सुन्दरतम बूँदे गिर रहीं मेरे आंगन में।

सावन मनभावन आ गया है रे साजन,
झूमने लगा अब तो मेरा अनमना मन।
हरी-हरी चूडिया कलाई को सजाती,
ह्दय का श्रृंगार लौट आया मेरे आंगन में।

मयंक छूकर मदहोश कर रही मुझको,
नजर इंतजार करके बुला रही तुझको।
हरियाली अंदर बाहर छा गई चारों ओर,
पतझर सा झरे कनेर,गोकर्णी मेरे आंगन में।

तरसे देखने को छवि कुनाल समझे कौन,
तन-तड़प मन जाने, मन-तड़प जाने कौन?
मधुर स्मृतियाँ, मृदुल अनुभूति प्राकाम्य,
उत्संग तरंग उन्मुख मिलन रूचि मेरे आँगन में।

आदर्श दुनिया क्या जाने प्रेमिल मिलन,
पुराना होता जा रहा हमारा प्रेम गगन ।
रात भर जगे जगाये याद हिलोरें खाकर,
प्रेम का जतन करना सजन मेरे आँगन में। ।

— प्रतिभा पाण्डेय “प्रति”

प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"

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