राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पाँच वर्ष : कार्यान्वयन की बाधाएँ और समाधान
2020 में जब भारत सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy – NEP) को प्रस्तुत किया, तो यह देश के शिक्षा जगत में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। यह नीति न केवल औपचारिक शिक्षा प्रणाली में सुधार की बात करती है, बल्कि शिक्षा को भारतीय संस्कृति से जोड़ने, वैश्विक प्रतिस्पर्धा हेतु तैयार करने और बच्चों के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने का एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। 34 वर्षों बाद आई इस नई नीति में ‘5+3+3+4’ की संरचना, मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा, डिजिटल नवाचार, कौशल आधारित शिक्षा और उच्चतर शिक्षा में लचीलापन जैसे कई ऐसे बदलाव प्रस्तावित किए गए जो इसे यथार्थवादी और दूरदर्शी दोनों बनाते हैं। यह नीति शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि नैतिकता, नवाचार और समावेशी विकास का माध्यम मानती है। लेकिन जिस प्रकार से इस नीति को लागू करने की प्रक्रिया आरंभ हुई, वह कई मोर्चों पर धीमी और टुकड़ों में बँटी हुई दिखाई दी। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में शिक्षा नीति का प्रभावी कार्यान्वयन तभी संभव है जब इसे जमीनी हकीकत के साथ जोड़कर देखा जाए और इसकी प्रत्येक बाधा का ठोस, व्यावहारिक और व्यापक समाधान खोजा जाए।
इस नीति की सफलता का सबसे बड़ा आधार शिक्षक हैं, लेकिन यथार्थ यह है कि भारत में अधिकांश शिक्षक न तो इस नीति की मूल भावना से परिचित हैं और न ही उन्हें नई शिक्षण पद्धतियों जैसे ‘learning, competency-based curriculum’, ‘formative assessment’ आदि का समुचित प्रशिक्षण मिला है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षक बहुधा एकाधिक कक्षाओं को एक साथ पढ़ा रहे हैं, संसाधनों की भारी कमी झेल रहे हैं और तकनीकी साक्षरता के अभाव में नीति के उद्देश्यों से बहुत दूर हैं। शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में अभी भी पुरानी पद्धतियाँ चल रही हैं, जो मौजूदा जरूरतों से मेल नहीं खातीं। समाधान यही है कि ‘सेवा पूर्व’ और ‘सेवा के दौरान’ प्रशिक्षण को पूरी तरह से नई शिक्षा नीति के अनुरूप पुनर्गठित किया जाए, जहाँ शिक्षक केवल आदेशपालक न रहकर शिक्षा के सह-निर्माता बनें। DIKSHA और SWAYAM जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को स्थानीय भाषाओं में अधिक उपयोगी बनाया जाए और प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों को सशक्त किया जाए।
बुनियादी ढाँचा नीति के क्रियान्वयन में दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है। NEP में ‘Foundational Literacy and Numeracy (FLN)’ को पहली प्राथमिकता दी गई है, लेकिन देश के हज़ारों सरकारी स्कूल अभी भी कक्षा-कक्ष, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, शौचालय और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। डिजिटल शिक्षा की बात की जाए तो लाखों बच्चे ऐसे हैं जो बिजली, इंटरनेट या स्मार्ट डिवाइसेज़ तक की पहुँच नहीं रखते। इस स्थिति में डिजिटल लर्निंग केवल शहरी छात्रों तक सीमित रह जाती है और ग्रामीण छात्र इससे पूरी तरह कट जाते हैं। इस बाधा को दूर करने के लिए वित्तीय संसाधनों का स्मार्ट और विकेन्द्रित उपयोग आवश्यक है। केंद्र व राज्य सरकारों को पंचायतों, CSR और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से स्कूलों के ढांचे में सुधार लाना चाहिए। प्रत्येक विद्यालय को न्यूनतम डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराना अनिवार्य किया जाए और डिजिटल असमानता को दूर करने हेतु ‘डिजिटल समावेशन मिशन’ शुरू किया जाए।
भाषा के मुद्दे पर नीति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कक्षा 5 (या जहाँ संभव हो, कक्षा 8) तक बच्चों को मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए। यह प्रस्ताव शैक्षिक मनोविज्ञान के अनुरूप है, जिससे बच्चों में गहरी समझ, भावनात्मक जुड़ाव और तर्क क्षमता का विकास होता है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में मातृभाषा की जगह अंग्रेजी को सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यावसायिक सफलता का माध्यम माना जाता है, जिससे अधिकांश अभिभावक मातृभाषा में शिक्षा को अवनति समझते हैं। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य शिक्षकों की कमी और स्थानीय भाषाओं में सामग्री के अभाव के कारण यह प्रयास ठोस स्वरूप नहीं ले पा रहा। समाधान यही है कि एक लचीली द्विभाषिक प्रणाली विकसित की जाए, जहाँ स्थानीय भाषा में शिक्षा के साथ-साथ कक्षा 6 से आगे अंग्रेजी की दक्षता को भी सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री का तेजी से निर्माण हो और शिक्षक भी भाषायी रूप से दक्ष बनाए जाएँ।
मूल्यांकन प्रणाली में सुधार NEP का एक अभिनव पक्ष है, जहाँ शिक्षा को केवल परीक्षा-केंद्रित प्रणाली से निकालकर सीखने की प्रक्रिया, विश्लेषण क्षमता, रचनात्मकता और नैतिक विकास के आधार पर आँकने की बात की गई है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश स्कूल अभी भी वार्षिक परीक्षा आधारित मूल्यांकन प्रणाली पर ही निर्भर हैं। शिक्षकों को formative assessments, project-based learning, peer reviews या portfolios की समझ और अनुभव नहीं है। इससे न केवल बच्चों में रटंत प्रवृत्ति बनी रहती है, बल्कि शिक्षक भी मानसिक दबाव में रहते हैं। इस बाधा को हल करने हेतु मूल्यांकन के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू किए जाने चाहिए जहाँ शिक्षक और छात्र दोनों को नई प्रणाली से परिचित कराया जाए। साथ ही, डिजिटल टूल्स और AI आधारित एप्स से मूल्यांकन को सरल, आनंददायक और प्रभावी बनाया जा सकता है।
NEP 2020 का उच्च शिक्षा से संबंधित खंड शिक्षार्थियों को अधिक स्वतंत्रता और लचीलापन देता है। Multiple Entry and Exit, Academic Bank of Credits और Interdisciplinary Learning जैसे प्रावधान वास्तव में उच्च शिक्षा को छात्र-केंद्रित बनाते हैं। परंतु देश के अधिकतर विश्वविद्यालय अभी तक पुराने पाठ्यक्रमों, कठोर प्रशासनिक ढांचों और अंकों पर आधारित मूल्यांकन प्रणाली पर निर्भर हैं। क्रेडिट ट्रांसफर, डिजिटल यूनिवर्सिटी और ऑनलाइन-ऑफलाइन कोर्स समायोजन अभी भी एक सपना है। इसके समाधान के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), नीति आयोग और उच्च शिक्षा विभाग को मिलकर संस्थानों की क्षमताओं का निर्माण करना होगा। Digital University, One Nation One Data Platform, credit repository systems को शीघ्रातिशीघ्र लागू कर संस्थानों को नई प्रणाली के अनुरूप बदला जाना होगा।
भारत जैसे सामाजिक विविधता वाले देश में NEP का सबसे बड़ा मूल्य यह है कि यह समावेशी शिक्षा की बात करता है। लेकिन जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और क्षेत्रीय विषमताएँ आज भी शिक्षा में बड़ी बाधा हैं। अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आज भी शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव, संसाधनहीनता और अवसरों की कमी का सामना करना पड़ता है। लड़कियों की स्कूली ड्रॉपआउट दर, जनजातीय क्षेत्रों में स्कूलों की अनुपलब्धता और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शैक्षणिक पिछड़ापन आज भी गंभीर मुद्दे हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए एक ‘समान अवसर आयोग’ जैसी संस्था को सक्रिय किया जाना चाहिए। Bridge Courses, Gender-Neutral Curriculum, Social Equity Scholarships जैसी पहलें नीति के समावेशी लक्ष्य को साकार कर सकती हैं।
नीति के क्रियान्वयन में राज्यों की असमान तत्परता भी एक बड़ी बाधा है। कुछ राज्य जैसे कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात ने NEP को लागू करने में पहल की है, जबकि अन्य राज्य अभी राजनीतिक, प्रशासनिक या वैचारिक कारणों से पीछे हैं। यह असमानता नीति के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधक बनती है। इसका समाधान यही है कि केंद्र सरकार राज्य स्तरीय Capacity Building Funds बनाए, राज्यवार कार्ययोजना तय करे और नीति आयोग द्वारा राज्यों के प्रदर्शन का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाए। Best Practice Exchange Platforms के माध्यम से एक राज्य के नवाचारों को अन्य राज्यों तक पहुँचाना चाहिए।
अंततः सबसे गंभीर चुनौती वित्तीय संसाधनों की है। नीति में स्पष्ट कहा गया है कि शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का न्यूनतम 6% खर्च होना चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह मात्र 3% के आसपास है। इस नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भारी पूँजी निवेश की आवश्यकता है – चाहे वह शिक्षक प्रशिक्षण हो, डिजिटल संरचना का निर्माण हो या मूल्यांकन प्रणाली में सुधार। समाधान यही है कि केंद्र और राज्य सरकारें Dedicated NEP Fund स्थापित करें, जिसमें निजी क्षेत्र और CSR की भागीदारी सुनिश्चित हो। Outcome-based Budgeting, Education Bonds और Social Return on Investment जैसे वैकल्पिक मॉडल से संसाधनों की सतत उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा के क्षेत्र में एक युगांतकारी दस्तावेज है। यह केवल पाठ्यक्रम का पुनर्गठन नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्रचना का संकल्प है। लेकिन यह तब तक सफल नहीं होगी जब तक इसे केवल एक सरकारी घोषणा पत्र मानकर छोड़ न दिया जाए। इसे राष्ट्रव्यापी आंदोलन की तरह अपनाने की आवश्यकता है जहाँ केंद्र, राज्य, पंचायत, शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी – सभी सक्रिय भागीदार बनें। तभी यह नीति भारत के भविष्य की सबसे सशक्त नींव बन सकती है, अन्यथा यह एक और अधूरी आशा बनकर इतिहास में दर्ज हो जाएगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
