लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 9)
तेरहवें दिन के कार्य पूर्ण करने के बाद शोकसंतप्त राजकुमार भरत जी से उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी इस प्रकार कहने लगे- “भैया! हम सबके जो सबसे बड़े सहारे हैं (श्री राम), वे एक स्त्री के द्वारा वन में भेज दिये गये, यह कितने खेद की बात है। जो लक्ष्मण जी बहुत शूरवीर हैं, उन्होंने पिताजी को बन्दी बनाकर श्री राम को इस संकट से क्यों नहीं निकाला? जब राजा एक नारी के वश में होकर ग़लत मार्ग पर चलने लगे थे, तभी उनको न्याय और अन्याय का विचार करके बन्दी बना लेना चाहिए था।” शत्रुघ्न जी इस प्रकार बहुत रोष में बोल रहे थे। भरत जी ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया।
उसी समय कैकेयी की कुब्जा दासी मंथरा विभिन्न प्रकार के आभूषणों से सजकर अन्य दासियों के साथ भरत जी का स्वागत करने महल के पूर्व द्वार पर आयी। एक द्वारपाल ने उसको पकड़ लिया और उसे घसीटकर राजकुमार शत्रुघ्न जी के पास ले गया। उसने शत्रुघ्न जी को बताया- “राजकुमार! श्री राम के वनवास और महाराज के प्राणान्त का मूल कारण यही दासी है। इसी ने सारा संकट उत्पन्न किया है।”
यह जानकर शत्रुघ्न जी का रोष और अधिक बढ़ गया। उन्होंने सबको सुनाते हुए कहा- “इस पापिनी ने जैसा कार्य किया है, वैसा ही फल इसे मिलेगा।” ऐसा कहकर उन्होंने मंथरा को बालों से पकड़ लिया और घसीटने लगे। यह देखकर मंथरा की साथिनी अन्य दासियाँ भयभीत होकर वहाँ से भाग गयीं। मंथरा भय के कारण चीख रही थी। तब रानी कैकेयी उसको छुड़ाने के लिए आयीं।
शत्रुघ्न जी को क्रोध में भरा देखकर भरत जी ने उनसे कहा- “शत्रुघ्न! इसको क्षमा करो। सभी स्त्रियाँ अवध्य होती हैं। यदि मुझे भैया श्री राम का भय न होता, तो मैं पापिनी कैकेयी को मार डालता। यदि श्री राम को कुब्जा के मारे जाने का पता चलेगा, तो निश्चित रूप से वे हमारा त्याग कर देंगे।” भरत जी की यह बात सुनकर शत्रुघ्न जी ने मंथरा को मुक्त कर दिया। अत्यन्त शोक और रोष से भरे होने पर भी राजकुमार भरत जी ने धर्म और मर्यादा को नहीं छोड़ा। अन्यथा, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था, वे अपनी माता कैकेयी का भी वध कर देते।
राजकुमार शत्रुघ्न के पंजे से मुक्त होकर मन्थरा रानी कैकेयी के चरणों में गिर गयी और उनकी ओर कातर दृष्टि से देखकर रोने लगी। कैकेयी उसे वहाँ से हटाकर अपने महल में ले गयी और उसे आश्वस्त किया।
महाराज दशरथ की तेरहवीं के अगले दिन अर्थात् चौदहवें दिन प्रातःकाल ही पहले की तरह मंगल वाद्य बजाये जाने लगे और चारण ‘राजा’ भरत की स्तुतियाँ गाने लगे। उस ध्वनि को सुनकर भरत जी की नींद खुल गयी और वे शोक से व्याकुल हो उठे। ”मैं राजा नहीं हूँ!“ यह कहकर उन्होंने समस्त वाद्य बन्द करा दिये। फिर वे शत्रुघ्न जी से कहने लगे- “शत्रुघ्न! देखो, कैकेयी ने कितना बड़ा अपकार किया है, जिससे महाराज तो स्वर्ग चले गये और हमारे बड़े भैया श्री राम वनवासी हो गये। आज उनके बिना राज्य बिना नाविक की नाव की तरह डगमग हो रही है।” यह कहकर वे फिर विलाप करने लगे। उनको विलाप करते देखकर रनिवास की सभी रानियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं।
उसी समय कुलगुरु मुनि वशिष्ठ जी ने राजभवन में प्रवेश किया और राजदरबार में अपने लिए निर्धारित सुवर्ण आसन पर विराजमान हुए। फिर उन्होंने सेवकों को आदेश दिया कि युधाजित और सुमंत्र जी सहित सभी मन्त्रियों, दोनों राजकुमारों, ब्राह्मणों, योद्धाओं आदि को तत्काल यहाँ बुला लाइए। आदेश पाते ही सेवकगण विभिन्न दिशाओं में गये और सबको एकत्र कर लाये। शीघ्र ही भरत जी तथा शत्रुघ्न जी भी वहाँ आकर उपस्थित हो गये और उन्होंने अपने गुरु की चरणवन्दना की। गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उचित आसनों पर बैठने का संकेत किया।
उसी समय सभी मंत्रियों ने भरत जी से इस प्रकार कहा- “यशस्वी राजकुमार! महाराज दशरथ के स्वर्गवासी होने और ज्येष्ठ भ्राताओं के वन में चले जाने के बाद इस राज्य का कोई स्वामी नहीं है। महाराज स्वयं यह राज्य आपको देने का आदेश दे गये हैं। अतः आपका राजा बनना पूरी तरह न्यायसंगत है। राजकुमार! आप अपने पूर्वजों के इस राज्य को अवश्य स्वीकार कीजिए। आपके अभिषेक की समस्त सामग्री तैयार है। इसलिए आप राजा के पद पर अपना अभिषेक करवाकर हम सबका पालन कीजिए।”
यह सुनकर भरत जी ने कलश सहित अभिषेक की समस्त सामग्री की प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित सभी लोगों से कहा- “सज्जनो! आप लोग बुद्धिमान हैं। हमारे कुल में सदैव सबसे बड़ा पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है और यही उचित भी है। इसलिए श्री राम ही हमारे राजा होंगे। उनके बदले में मैं चौदह वर्ष तक वन में निवास करूँगा। आप लोग सेना सहित सभी को तैयार कीजिए। मैं यह सामग्री लेकर श्री राम से मिलने वन में चलूँगा। वहीं श्री राम का अभिषेक करके मैं उन्हें अयोध्या लौटा लाऊँगा। मैं कभी कैकेयी की अनुचित इच्छा को पूरी नहीं होने दूँगा। श्री राम ही यहाँ के राजा होंगे। आप वन के मार्ग को तैयार कराइए और मार्ग का ज्ञान रखने वाले लोगों को साथ रखिए।”
यह सुनकर सभी मंत्री मौन होकर उनकी ओर देखते रह गये। भरत जी की आज्ञा के अनुसार मंत्रियों ने अयोध्या से गंगा तट तक मार्ग की सफ़ाई करने और अन्य व्यवस्थाएँ करने के लिए पर्याप्त संख्या में राजकर्मचारी और श्रमिक भेज दिये।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 4, सं. 2082 वि. (28 जुलाई, 2025)
