मुलम्मा
सोचा कुछ लिखू आज खुद पर
हिम्मत न हुईं लेकिन
कैसे बयाँ करू सच अपना
मैंने तो खुद पर
एक मुलम्मा चढ़ा रखा है दिखावे का
अगर उतारता हूँ इसे
तो तार तार हो जायेगा भ्रम लोगों का
हर बार यही सोच रुक जाता हूँ
भ्रम बना है जो बना रहने दो
सभी तो ऐसी ही जी रहे हैं
मुलम्मा चढ़ाये अपने पर
एक दूसरे से बेहतर दिखने का
