राजनीति

हाईकोर्ट की ऐतिहासिक फटकार

सांस्कृतिक राष्ट्र में जहां मां को ईश्वर का दर्जा प्राप्त है, वहां यदि किसी 100 वर्षीय मां को मात्र ₹2000 मासिक भत्ते के लिए अपने ही बेटे से अदालत में न्याय मांगना पड़े, तो यह केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि एक सामाजिक, नैतिक और विधिक पराजय का प्रतीक बन जाता है। केरल हाईकोर्ट का 1 अगस्त 2025 का यह ऐतिहासिक निर्णय न केवल न्याय की स्थापना करता है, बल्कि समूचे समाज को आत्ममंथन की ओर ले जाने वाला झटका देता है।

घटनाक्रम का संक्षिप्त विवरण:
केरल हाईकोर्ट में रिट पिटीशन क्रमांक RP(FC) No. 253/2025 में एक 57 वर्षीय बेटा उन्नीकृष्णा पिल्लई, फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने पहुंचा, जिसमें उसे अपनी 100 वर्षीय मां जानकी अम्मा को ₹2000 मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था।

यह आदेश अप्रैल 2022 में पारित हुआ था, लेकिन बेटे द्वारा भुगतान न किए जाने के कारण राजस्व वसूली की कार्यवाही शुरू की गई। इसके बाद हाईकोर्ट में वह अपील लेकर पहुंचा, जिसमें उसने तर्क दिया कि उसकी मां उसके बड़े भाई के साथ रहती हैं और अन्य संतानें भी हैं, तो अकेले उसे क्यों जिम्मेदार ठहराया जाए।

हाईकोर्ट का फैसला और कड़ी टिप्पणी:
माननीय उच्च न्यायालय ने बेटा द्वारा 1,149 दिनों की देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि:

“मैं गहरी शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूं कि एक 100 वर्षीय मां केवल ₹2000 के लिए अपने ही बेटे से लड़ रही है। यह हमारे समाज की नैतिक गिरावट का प्रतीक है।”

मुख्य बिंदु:

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व:
अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण की जिम्मेदारी प्रत्येक सक्षम संतान की व्यक्तिगत होती है, भले ही माता-पिता किसी और संतान के साथ रहते हों।

मूल्य आधारित संदेश:
न्यायमूर्ति ने कहा कि बच्चों को वही मूल्य अपनाने चाहिए जो मां ने उन्हें सिखाए—धैर्य, प्रेम और करुणा। वृद्धावस्था में माता-पिता से बच्चनुमा व्यवहार की अपेक्षा पर सहानुभूति से प्रतिक्रिया देना चाहिए।

देरी माफ लेकिन चेतावनी स्पष्ट:
अदालत ने पुनरीक्षण याचिका की देरी को स्वीकार किया परन्तु खर्च लगाए जाने की चेतावनी के साथ माफ कर दिया।

यह निर्णय क्यों ऐतिहासिक है?
विधिक दृष्टि से:
यह निर्णय महज़ ₹2000 की राशि के लिए नहीं बल्कि कर्तव्य के महत्व को पुनःस्थापित करता है। इसने यह स्पष्ट किया कि पुत्र द्वारा माता-पिता की सेवा कोई कृपा नहीं, बल्कि अनिवार्य उत्तरदायित्व है।

नैतिक दृष्टिकोण से:
इस फैसले ने समाज के उस चेहरे को उजागर किया है जो वृद्धजन को बोझ मानता है और उन्हें त्याग देता है। न्यायालय ने इसे “शेमफुल” (लज्जाजनक) कहा।

नीतिगत महत्त्व:
यह निर्णय संसद में नीति निर्धारण हेतु दिशा देता है कि देश में माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए कठोर कानून बनाए जाएं।

वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य और अयोध्या प्रकरण:
भारत में वृद्धजनों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ रही हैं। अयोध्या में 80 वर्षीय बुजुर्ग मां को सड़क पर फेंकने की घटना इसका ज्वलंत उदाहरण है। इस प्रकार की घटनाओं पर केवल संवेदना नहीं, कड़ा विधिक उत्तरदायित्व तय होना चाहिए।

प्रस्तावित विधेयक: “माता-पिता व वरिष्ठ नागरिक (अत्याचार, अपमान, दुर्व्यवहार निवारण) विधेयक 2025”
इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में एक सशक्त कानून लाने की तत्काल आवश्यकता है। मैं, एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं, यह प्रस्ताव करता हूं कि:

संसद के दोनों सदनों (लोकसभा + राज्यसभा = 788 सदस्य) इस विधेयक को मानसून सत्र में ही 788/0 मतों से पारित कर समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करें।

इसमें निम्नलिखित प्रावधान होने चाहिए:

वृद्ध माता-पिता के परित्याग पर कठोर दंड (उम्रकैद तक)
सरकारी सेवकों द्वारा दुर्व्यवहार पर सेवा समाप्ति
वित्तीय अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक पेंशन की अनिवार्यता
फास्ट ट्रैक अदालतें

सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरें और यह निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी कीर्तिकांत द. वड़ोदरिए बनाम स्टेट ऑफ़ गुजरात, और विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि माता-पिता की देखभाल केवल नैतिक नहीं, संवैधानिक उत्तरदायित्व है। केरल हाईकोर्ट का यह निर्णय इन निर्णयों की पुष्टि करता है।

शिक्षा और नीति में समावेश की ज़रूरत:
यह निर्णय केवल अदालती फैसला नहीं बल्कि “मूल्य शिक्षा” का पाठ है। इसे विधि विश्वविद्यालयों, प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों, और विद्यालयों में केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

आर्थिक राशि नहीं, मानवीय मूल्यों का सवाल:
₹2000 की राशि यहां प्रतीक मात्र है। यह निर्णय धन नहीं, मन और मान का है।
मां-बाप को त्यागने वालों के विरुद्ध यदि आज ठोस संदेश नहीं दिया गया, तो कल यह रोग महामारी की तरह समाज में फैल जाएगा।

समाज को मिला संदेश:
मां-बाप की सेवा कृपा नहीं, जिम्मेदारी है
वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा केवल कानून का उल्लंघन नहीं, संवेदनाओं की हत्या है
यदि कोई मां अपने अंतिम जीवन में सुरक्षा के लिए न्यायालय जाए, तो यह केवल बेटों की नहीं, समूचे समाज की हार है
निष्कर्ष:
1 अगस्त 2025 का दिन भारतीय न्यायिक इतिहास में कर्तव्य और करुणा के संगम के रूप में दर्ज हो चुका है। केरल हाईकोर्ट के इस निर्णय ने साबित कर दिया कि न्याय केवल निर्णय नहीं, दिशा भी देता है।
यह एक मां की जीत नहीं, हर उस मां की जीत है जो केवल सम्मान, सहारा और थोड़ी सी संवेदना चाहती है।

अंत में एक आह्वान:
आइए, इस निर्णय को केवल पढ़कर न छोड़ें, इसे अपने व्यवहार में उतारें। माता-पिता की सेवा में समय, धन और सम्मान देना हमारी परंपरा भी है, और संविधानिक कर्तव्य भी।
अब वक्त आ गया है कि हम केवल ‘श्राद्ध’ न करें, बल्कि “सजीव श्रद्धा” का प्रमाण दें।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया