धराली धराशायी हो गई
धराली धराशायी हो गई,
विपदा भी व्यस्त हो गई,
प्रकृति-प्रेम के झूठे वादों से,
पर्वतीय धरा ध्वस्त हो गई।
गरजे-बिना गरजे थे बादल फटे,
बाढ़ आई क्योंकि जंगल थे कटे,
कंकालों से भर गई धराली सारी,
काश, हमने केवल वादे ही नहीं रटे!
माँ भारती को रहने के लायक छोड़ो,
खुद ही अपनी तरफ सायक मत मोड़ो,
वायु-जल-थल को तो दूषित किया ही,
प्रकृति की लाश पर तो मत दौड़ो!
हँसती हुई वादियाँ आज रो रही हैं,
मां अपने बच्चों की लाशें ढो रही हैं,
अतृप्त रह गए सुनहरे भविष्य के सपने,
जीने की आशाएं भी धूमिल हो रही हैं!
— लीला तिवानी
