कविता

मीठा बैरी

घर परिवार,रिश्तेदार में
पता है कौन है बैरी मीठा,
वहीं जिसे समझ न पाया
सगा भाई मोह में बनकर
न समझ पाया विचार ऐरा गैरा,
जितना खून के आंसू अपना रुलाता है,
उतना जग में कोई नहीं तड़पाता है,
एक ही खून में कहां से आता है फरेब,
तड़पाने में मात खा जाये अंग्रेज,
तब भाई को अपने स्वार्थ की चिंता होगी,
जैसे गृहस्थ भाई बन चुका है निरा जोगी,
ये खुशी की बात है कि
भाई दुश्मनों के कमी की अहसास
अपने ही भाई को होने नहीं देता है,
हर अगले पिछले का हिसाब खुलकर लेता है,
इन्तेहां तो तब होती है
जब मां अपने दुलारे बेटे का पक्ष लेती है,
पक्ष लेते लेते कब मां बन जाती है पराई,
बिल्कुल ही समझ नहीं आता,
दिक्कत तो तब होती है जब
अपना ही अपने को है रुलाता,
हां मैं अपनों के सितम का मारा हूं,
मां,भाई,बहन के बीच
बन गया दुश्मन बेचारा हूं,
झुंठों के झूंठे लगाव को
समझ न पाना शायद मेरी कमजोरी है,
अपने हक़ को खाने वाले अपने का
विरोध करूं तो सब कहेंगे
ये तो इस आदमी का बेखौफ सीनाजोरी है,
बैरी मेरे दिल में बसा है करूं कौन सा इलाज,
भाई के दुश्मन बनने का शुरू हो चुका है
खांटी और अचूक रिवाज,
हां मेरे सबसे हितैषी दुश्मनों
कामना अधूरी रहेगी कि मेरे लिए मौत बुलाओ,
आप सबके तेवर साफ कह रहे
इनके लिए जल्दी मौत बुलाओ,
मैं कभी मर भी गया तो
मेरी रूह को आस रहेगी सब खुशी मनाओ।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554