मेरी पहली मुहब्बत,एक अधूरी दास्तान।
वो चेहरा… उसको पहले तो यहाँ कभी नहीं देखा था, लेकिन जिस दिन पहली बार नज़र आई, मेरी रग-ओ-पुख़्तगी जैसे थम गई। मेरी इस डायरी के पन्नों में अगर तुम अपने आपको तलाश करोगे, तो तुम्हें ये मेरी नहीं बल्कि कहीं न कहीं अपनी ही मोहब्बत की दास्तान लगेगी, क्योंकि इश्क़, मोहब्बत और प्यार, चाहे नाम कुछ भी हो, असल में एक ही जज़्बा है। उसका अंजाम कभी खुशी है तो कभी ग़म, और ये ग़म-ओ-सुख़ून इंसान के इख़्तियार में नहीं। जिस्म की हद तक हम आज़ाद हैं, मगर दिल के मुसाफ़िर अपने मुक़द्दर के ग़ुलाम होते हैं। मोहब्बत की कहानी अक्सर वहीं जाकर टूट जाती है, जहाँ हम सोचना भी नहीं चाहते। ज़्यादातर दिल जो इश्क़ कर बैठते हैं, बाद में टूटकर बिखर जाते हैं, जैसे हवा के झोंके में सूखा पत्ता।मेरा प्यार भी अधूरा रहा, लेकिन मैं जानता हूँ कि सच्ची मोहब्बत न वक़्त की मोहताज होती है, न ज़ात-पात की, न उम्र की, न दिन-रात की। दुनियावी रस्में और सरहदें उसे बांध नहीं सकतीं। तवारीख़ गवाही देती हैं कि कई मोहब्बतें जुदाई में भी मुकम्मल रही हैं। मगर इस सिलसिले में मेरी किस्मत बहुत तल्ख़ निकली। मैंने कई रातें और कई दिन ख्वाबों के महल बनाने में बिताए, लेकिन जब वो ख्वाब हक़ीक़त के संगरेज़ों से टकराए, तो मेरा वजूद भी बिखर गया। लोगों की ज़ुबान ने मुझे पागल कह दिया।वक़्त के मरहम ने ज़ख्मों के ऊपरी निशान को तो भर दिया, मगर मोहब्बत के वो निशान अब भी ज़िंदा हैं। कभी-कभी उनका एहसास मुझे पकड़कर माज़ी में ले जाता है, उस जगह जहाँ मैंने उसे पहली बार देखा था। अल्लाह गवाह है, वो पहली नज़र कैसी बला थी… वो लम्हा मोहब्बत के दरीचे में से छनकर आया, जिसमें सुकून भी था और दर्द भी, बहार भी और पतझड़ का अहसास भी।वो सर्दियों के दिन थे, जब गलियों में ठंडी हवाएं बेफिक्री से इठलाती फिरती थीं। उन दिनों मैं इस शहर के एक मुकामी स्कूल में मास्टर था। छुट्टी का वक़्त करीब था कि अचानक मैंने खिड़की के बाहर से झांकता एक खूबसूरत चेहरा देखा, एक लड़की, जिसकी आँखों में अद्भुत चमक थी। मैंने सोचा ये कौन है, पहले तो इसे यहाँ कभी नहीं देखा। उसी पल उसकी नज़र मेरी नज़र से टकराई, और वो शरमाते हुए अपनी पलकें झुका गई, जैसे मेरी आँखों में उतर जाने से डर रही हो, या शायद इसीलिए उतर रही हो कि वहाँ हमेशा के लिए ठहर जाए।इतने में, मेरे साथ पढ़ाने वाले एक टीचर ,सलीम साहब, और उनकी बीवी, जो शहर के दूसरे स्कूल में अध्यापिका थीं, स्कूल की ओर आते दिखाई दिए। उनकी स्कूल का रास्ता मेरे स्कूल के सामने से ही होकर गुजरता था। उस ज़माने में सभी स्कूल तक पैदल ही जाया करते थे, बाइक का जमाना नहीं था,उस वक़्त उनसे पूछना मुनासिब न समझा। छुट्टी का वक़्त हो चुका था, बच्चे अपना बस्ता सँभाल रहे थे, और वो लड़की उन्हीं बच्चों के साथ खड़ी थी। मैंने सोचा शायद ये किसी के घर-बाहर से आई कोई मेहमान हो। बात आई-गई हो गई।
मगर अगले दिन, लगभग उसी वक्त, मैंने उसे फिर देखा। इस बार मैंने दिल की बेचैनी को दबा न सका और सलीम साहब से उसके बारे में पूछ ही लिया। वो मुस्कुराते हुए बोले, “अरे, ये तो मेरी बीवी की छोटी बहन है। हाल ही में यहाँ हिंदी गवर्नमेंट मिडिल स्कूल में दाख़िल हुई है, बहुत तेज़ है, हमारे शहर से आई है। और मैं सोच रहा था कि चूंकि तुम्हारा मैथ्स और साइंस का हाथ बहुत मजबूत है, तुम इसे पढ़ा दिया करो।”
उस वक़्त मेरे दिल में जैसे चुपके से एक सितारा गिरा हो, मगर होंठों पर बस इतना आया, “देखते हैं, वक्त मिला तो ज़रूर।” मैंने थोड़ा ना-नुकुर किया, मगर सलीम साहब ने इसरार किया, “भाई, ज़रा वक्त निकाल दो, अपने ही घर की बात है।” और मैंने हालात को गनीमत समझते हुए हामी भर दी।
शुरू में हमारी मुलाक़ातें सीमित थीं, सवाल-जवाब, गणित के फार्मूले, विज्ञान की बातें, मगर इन लफ्ज़ों के पीछे बहता था एक खामोश दरिया जो दोनों के दिलों तक पहुँचता था। वो पढ़ाई में तेज़ थी, मगर अकसर नज़रें झुका लेती। जब कभी मेरी ओर देखती, तो दिल में जैसे मौसम बदल जाता — कभी बसंत की नर्मी, कभी सावन की रिमझिम, कभी पतझड़ का सूना पन।
दिन गुजरते गए और हमारी मोहब्बत किताबों के पन्नों के बीच पलने लगी। अनकहे इकरार का आलम ये था कि एक सवाल पूछते वक्त उसका हाथ अचानक मेरे हाथ से छू जाए तो मेरी रूह में हलचल दौड़ जाती, और वो हलचल कई दिनों तक मेरे साथ रहती।
मगर मोहब्बत के आसमान पर बादल जमा होने लगे थे। एक दिन सलीम साहब की बीवी ने अनायास कहा, “हमने इसका रिश्ता अपने खानदान में तय कर दिया है, अगली बसंत में निकाह होगा।” उस लम्हे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी सांसें खींच ली हों, जैसे सारे ख्वाब किसी ने बेरहमी से तोड़कर रौंद दिए हों। वो चुप खड़ी थी, उसकी आँखों में एक सैलाब कैद था, मगर लब ख़ामोश थे।
निकाह से एक रोज़ पहले, वो आखिरी बार पढ़ाई के बहाने आई। हमने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, बस निगाहें मिलीं और रूहों ने एक-दूसरे को ख़ामोशी से अलविदा कह दिया। मैंने अपनी डायरी से एक पन्ना निकालकर उसे दिया, जिस पर लिखा था।
“अगर मोहब्बत सच्ची हो, तो जुदाई सिर्फ़ जिस्मों की होती है, रूहें हमेशा साथ रहती हैं…”
और वो पन्ना उसने सीने से लगाकर रख लिया, फिर बिना पीछे मुड़े चली गई।
उसके बाद वक़्त… वक़्त ने अपनी रफ्तार दिखा दी। तीस साल यूँ गुज़र गए जैसे हवा का झोंका। ज़िंदगी ने अनेक मोड़ दिए, लेकिन मेरे दिल का एक कोना हमेशा उसी लम्हे में ठहरा रहा, जहाँ पहली बार उसकी आँखों ने मेरा नाम लिखा था। अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि आज भी मेरे पास उसका मोबाइल नंबर है। कई बार हिम्मत करके कॉल किया, मगर जैसे ही “Hello” की आवाज़ आई, दिल ने साथ छोड़ दिया… और मैंने जल्दी से कह दिया, “गलत नंबर” — और फोन काट दिया।शायद डर था, कि कहीं मैं उसकी ज़िंदगी में एक अनचाही दस्तक न बन जाऊं, शायद ये भी कि मोहब्बत अगर पाक है, तो उसकी ख़ामोशी ही उसकी सबसे खूबसूरत शक्ल है। इन तीस वर्षों में, दिल में बस यही ख्वाहिश रही, एक बार उसे देख लेना, बस एक बार, न कोई शिकायत, न कोई सवाल, बस उसकी आँखों का वो सुकून फिर महसूस कर लेना।मैं आज भी कभी उसकी सहेलियों, कभी रिश्तेदारों से उसका हाल पूछ लेता हूँ। अगर कोई पुरानी तस्वीर मिल जाती है, तो दिन भर दिल जवान हो जाता है। शायद यही मोहब्बत का हासिल है, दिल जलता रहा, मगर रौशनी देता रहा। जुदाई सिर्फ़ जिस्मों की रही, रूह तो आज भी उसी की परिक्रमा करती है।और अब… मेरी डायरी का ये आखिरी सफ़ा भी उसी के नाम है।
मेरी मोहब्बत, जो मुकद्दर में न थी, मगर हमेशा मेरी रही।अधूरी मोहब्बत,यादों की जंजीरों में क़ैद हो गई।मोहब्बत एक ऐसा जज़्बा है जो पूरा होने की शर्त पर नहीं, बल्कि सच्चे एहसास की गहराई पर ज़िंदा रहता है। कुछ मोहब्बतें मंज़िल तक नहीं पहुँच पातीं, फिर भी उनकी गूंज उम्र भर दिल और ज़हन में तैरती रहती है। वो वादे जो कभी पूरे न हो सके, वो ख्वाब जो आँखों में ही टूट गए, और वो लम्हे जो वक़्त की रफ़्तार में पीछे छूट गए,दिल उन्हें भुलाने के बाद भी अपने अंदर सहेजे रखता है।
“वो मोहब्बतें जो मिल न सकीं, इश्क़ अधूरा ही रहा”,इन अल्फ़ाज़ में वो दर्द दबा है जो वक़्त बीत जाने के बाद भी कम होने का नाम नहीं लेता। शायद तक़दीर ने साथ न दिया, हालात ने राहें बदल दीं, मगर दिल वहीं ठहर गया, जहाँ कभी चाहत ने जन्म लिया था।
कसमें, वादे और ख्वाब , सब बेमानी लगने लगे जब मंज़िल न मिल सकी। वो हर लम्हा जो कभी दो दिलों के बीच पिरोया गया था, अब सिर्फ़ यादों की तस्वीर बनकर रह गया। फिर भी क्यों वो चेहरे, वो आवाज़ें, वो लम्हे ज़ेहन से मिटते नहीं? क्यों हर रात चाँद को देखकर दिल ये चाहता है कि वो उनका पैगाम पहुँचा दे— जैसे कोई चकोर चाँद के दीदार का प्यासा हो।जब मोहब्बत अधूरी रह जाए, तो वो एक रोग बन जाती है,न जीने देती है, न मरने।ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है, मगर दिल के किसी ख़ामोश कोने में वही नापाई मोहब्बत सांस लेती रहती है।शायद इसी लिए कहा जाता है,”कुछ यादें उम्र की क़ैद होती हैं, और कुछ चेहरे वक़्त की धूल में भी नहीं मिटते।”चाहे वो मोहब्बत कभी मुकम्मल न हुई हो, लेकिन उसकी पवित्रता और बेनियाज़ी आज भी रूह को छू जाती है। यह इश्क़ की नाकामी नहीं, बल्कि उसकी शिद्दत की जीत है कि वो आज भी दिल में जिंदा है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़”
