बाल कविता

बन जाऊं मैं बच्चा छोटा

मुझको बड़ा सुहाना लगता, कोई भी हो मेला,
मेले में हो सजे-सजाए, लोगों का बस रेला।
कुल्चे-छोले-रबड़ी-कुल्फी, खेल-खिलौने न्यारे,
झूले-हाथी-ऊंट सवारी, मेले के खेल निराले।
मेले के झूलों के क्या कहने, छोटा झूला, बड़ा झूला,
ऊंचा झूला, चकरी वाला झूला, झूलूं मैं हर इक झूला!
सावन में दीदी लगाए नीम पर झूला, वो भी झूलूं,
झूला झूलने में मस्त हो जाऊं, खाना-पीना भूलूं।
बचपन में पापा ने झुलाया मुझे बांहों का प्यारा झूला,
मां का लोरी सुना सुलाने का झूला, अब तक न भूला!
स्कूल का पट्टी वाला झूला, ऊंचा जाए तो कूदी लगाना,
रेत में गिरकर उठना, कपड़े झाड़ना, मित्र को झुलाना।
अब भी झूला दिखे कहीं तो बन जाऊं मैं बच्चा छोटा,
पैसे देकर झूला झूलूं, समझना न मुझे नितांत खोटा।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244