बाल कविता

लोरी

मां की मीठी लोरी आज भी, कानों में है गूंज रही,
चांद-खिलौना दूंगी तुझे मैं, आज भी नहीं मैं भूल रही।
परियों के देश में ले चल निंदिया, मेरी बिटिया रानी को,
ख्वाब न टूटने देना इसके, बिटिया मेरी सयानी हो।
घूंट-घूंट कर दूध पिलाना, थपकी देकर मुझे सुलाना,
थोड़ी हिलचुल करूं अगर मैं, फिर से लोरी गाना-सुनाना।
बरसा देना मधुर चाँदनी, लोरी में चंदा से कहना,
जुग-जुग जीवे तेरी चाँदनी, निंदिया बिटिया का गहना!
लोरी गाकर मुझे सुलाती, निंदिया रानी को पास बुलाती,
भौरों को गुनगुन करने न देती, मां की लोरी मुझको भाती।
आज नहीं है मां पर लोरी ही, ढल रही गीत-कविताओं में,
इतना प्रवाह था उस लोरी में, जितना होता सरिताओं में!

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244