कौन आ गया किसके बीच
हमारे न किए गए गुनाहों की
सजा मुक़र्रर है साहब,
हमारी पैदाइश गलत नहीं हो सकता
आपके नियम गड़बड़ है साहब,
पैदा होते ही पता नहीं
कैसे हो जाते हैं मनहूस,
तुम्हारे महलों की बराबरी न कर
अपना ठिकाना बना लिया घास फूस,
आज तक समझ ही नहीं आया कि
हम बलहीन हैं या ताकतवर,
शायद बलहीन हैं क्योंकि
कोई कहीं भी कभी भी
मार देता है थप्पड़ या गंडासा,
कभी घड़ा छू देने पर,
कभी आटा चक्की चले जाने पर,
कभी चेहरा दिख जाने पर,
या कभी हमारी साया पड़ जाने पर,
या वाकई हम हैं जन्म से बलशाली,
हमसे करनी पड़ जाती है सदा
उनके सर्वशक्तिमान आकाओं की रखवाली,
हर हमेशा लिए घूमते रहते हैं
अशुद्धता और अपवित्रता की ताकत,
जो होता है कुछ की नजर में हिमाकत,
कभी कभी तो सोचता हूं कि
किन मानसिक बीमारों के बीच हम आ गए,
या हमारे बीच पैठ बना लिए हैं
सारे के सारे परदेशी नामुराद,
जिस तरह से दिख रही है लकीरें
चाहे तो और भी बड़ा सा खींच,
आज तो खुलकर बताना ही होगा
कब,कौन आ गया किसके बीच।
— राजेन्द्र लाहिरी
