मित्रता
सुदामा पूजा-अर्चना करने के बाद पत्नी की ओर देखा।पत्नी को उदास देख पूछा,”क्या बात है सुशीला,कुछ उदास लग रही हो?”
पत्नी बोली, “कुछ नहीं, प्रसाद ग्रहण कीजिए।”
पत्नी ने दो बतासे और पानी दिया।
दोनों चारपाई पर बैठ बात करने लगे।
पत्नी-“देखो जी,आज चावल बिल्कुल नहीं है। बच्चों को क्या खिलाऊँगी?हम लोग एक दो दिन भूखे रह सकते हैं,
पर बच्चे भूखे कैसे रहेंगे?”
सुदामा- “नारायण-नारायण!” उनकी कृपा से कुछ न कुछ व्यवस्था हो जाएगी।”
पत्नी- “लेकिन इस तरह से कब तक चलेगा?”
सुदामा- “हम ब्राह्मण के पास धन-दौलत कहाँ से आयेगी।पूजा पाठ से जो मिल जाए, उसी से संतुष्ट होकर जीवन निर्वाह हो जाएगा,सुशीला।”
पत्नी- “आप तो यजमानों से अधिक कुछ माँगते भी नहीं।
सुदामा- “नारायण-नारायण! क्या कहती हो, सुशीला। ब्राह्मण के लिए आत्मसम्मान से बड़ा कुछ नहीं। सांदीपनि ऋषि से मैंने यह सीखा कि “विद्वान गरीब हो सकता है, पर दीन नहीं। भीख माँगने अथवा पारिश्रमिक से अधिक माँग करने से अनर्थ हो जाता है।”
पत्नी- “ठीक है आर्यपुत्र! लेकिन एक बात कहूँ, बुरा तो नहीं मानेंगे?”
सुदामा- “कहो सुशीला, क्या कहना चाहती हो?
पत्नी की बात से मैं क्यों बुरा मानूं?”
पत्नी- “आपने जिस सांदीपनि ऋषि के आश्रम में ज्ञानार्जन किया वहाँ आपके सखा श्रीकृष्ण ने भी शिक्षा ग्रहण की। आप कहते भी हैं वे आपके परम मित्र हैं।”
सुदामा- “बिल्कुल हैं।द्वारका के राजा श्री कृष्ण मेरे सहपाठी और परम मित्र हैं।”
सुशीला-“श्रीकृष्ण राजा और उनके मित्र रंक?”
सुदामा- “मित्रता में छोटे बड़े राजा-रंक का भेद नहीं होता सुशीला।
श्रीकृष्ण परम स्नेही हैं। मेरे सखा मेरे आदर्श हैं।”
सुशीला- “क्यों नहीं आप एक बार अपने मित्र से मिल आएँ! आपकी गरीबी देख वे जरूर कुछ देंगे आपको।”
सुदामा- “नारायण-नारायण!” कैसे उनसे कुछ माँगूँगा सुशीला।
मैं अपने सखा की नज़रों से गिर नहीं जाउँगा?”
पत्नी- “आपको माँगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी आर्यपुत्र!
बरसों से आपके मित्र की कीर्ति की बातें सुनती आ रही हूंँ। वे आपको निराश नहीं करेंगे।एकबार मित्र से मिल लेने में क्या हर्ज है।
बरसों बाद दो मित्र मिलेंगे कितनी खुशी होगी आप दोनों को।”
पत्नी की बातों से सुदामा को श्रीकृष्ण के साथ बिताये दिनों की यादें हरी हो गईं।
“ठीक है सुशीला,तुम कह रही हो तो मैं जाऊँगा, लेकिन अपने दोस्त से बरसों बाद मिलूँगा तो… उनके लिए कुछ भेंट…!”
पत्नी ने बीच में ही टोकते हुए कहा,”आपके मित्र राजा और आप गरीब ब्राह्मण! अपना प्रेम भाव देकर मित्र को खुश कर देंगे आप।”
सुदामा ने बड़े नम्र होकर कहा- “फिर भी कुछ…. लेकर जाता तो सखा को प्रसन्नता होती।”
“ठीक है, मैं देखती हूँ” सुशीला ने कहा और रसोई घर में प्रवेश किया।
सुशीला ने देखा,भंडार में दो मुट्ठी चावल,और यजमान के घरों से मिला थोड़ा चूड़ा है। बाहर आकर बोली-
“आर्य पुत्र,आपके मित्र के लिए दो मुट्ठी चावल है। आप थोड़ा -सा चूड़ा खा लें और आज ही द्वारका के लिए प्रस्थान करें।”
“जानती हो सुशीला,आश्रम में श्रीकृष्ण मेरे हिस्से का कुछ चबैना और फल चुपके से खा जाता था।” सुदामा कहना चाहते थे पर कह नहीं पाए।
नाश्ता करने के बाद सुदामा अपने मित्र की द्वारिकापुरी के लिए निकल पड़े।
अक्षय तृतीया के दिन सुदामा द्वारिका पुरी पहुँचे।
लम्बा रास्ता और कड़ी धूप,
थकावट से सुदामा के चेहरे का रंग उतरा हुआ था।
द्वारिका की साज-सज्जा देख सुदामा पहली बार अपनी दैन्य दशा को समझ पाए।
द्वार पर एक गरीब ब्राह्मण को देख द्वारपाल ने उनसे पूछा, “हे विप्र आप कौन हैं? आपका कैसे आना हुआ?”
“श्रीकृष्ण मेरे गुरुभाई हैं। मैं उनसे मिलने आया हूं। मेरा नाम सुदामा है।” सुदामा ने जवाब दिया।
द्वारपाल सुदामा की बात सुनकर अचरज में पड़ गया।
“ठीक है,आप ठहरिए! मैं भूपति श्रीकृष्ण को आपका संदेश देता हूँ।”
द्वारपाल से सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण नंगे पाँव अपने बचपन के मित्र से मिलने द्वार पर पहुँचे और सुदामा को गले लगा लिए।। श्री कृष्ण की आँखों से प्रेम के आँसू झरझर बहने लगे।
अपने मित्र को सम्मान के साथ राजगद्दी पर बैठाए।
पत्नी रुकमणी के साथ स्वयं कृष्णजी ने सुदामा के पैर पखारे।
सुदामा को फल-फूल, विभिन्न प्रकार के व्यंजन खिलाने के बाद घर-परिवार की कुशल क्षेम पूछी।
मजाक -मजाक में श्रीकृष्ण ने पूछ ही लिया कि भाभी ने मेरे लिए क्या भेंट भेजी है।
श्रीकृष्ण ने देख लिया था कि सुदामा एक पोटली अपने बगल में छुपा रखी है।
स्वभाव से चंचल और विनोदी श्रीकृष्ण ने पोटली को एक तरह से छीनते हुए ले ली।
श्रीकृष्ण समझ गए थे कि उनका मित्र लज्जा वश पोटली नहीं दे रहे हैं।
“वाह भैया, भाभी ने मेरे लिए कितनी स्वादिष्ट भेंट भेजी हैं” श्री कृष्ण ने कहा।
“हाँ मित्र, तुम्हारी सुशीला भाभी साक्षात लक्ष्मी हैं।”
श्री कृष्ण ने सुशीला भाभी के लिए प्रणाम कहा।
“भाई सुदामा,अब आप विश्राम कीजिए। मेरा सौभाग्य है कि आप आए”श्री कृष्ण ने कहा।
मित्र के जीर्ण-शीर्ण शरीर और गरीबी हालत को देख श्रीकृष्ण को बहुत कष्ट हुआ।
सुदामा को जानकारी में लाए बगैर श्रीकृष्ण ने अपने आदमी भेजकर सुदामा की झोपड़ी की जगह घर में सारी सुविधाओं से युक्त पत्नी तथा बच्चों के लिए सुंदर वस्त्र एवं आभूषण आदि की व्यवस्था के साथ भव्य भवन खड़ा करवा दिया।
सुदामा की पत्नी सुशीला दोनों के मैत्री भाव और श्रीकृष्ण की महानता से अभिभूत हो गई।
कुछ दिन ठहर कर सुदामा ने श्रीकृष्णजी से विदा लेकर घर के लिए प्रस्थान किया।
रास्ते में सुदामा मित्र के वैभव और व्यवहार की मन ही मन प्रशंसा कर रहे थे। परन्तु लौटते वक़्त श्रीकृष्णजी के द्वारा कुछ नहीं दिए जाने पर मन ही मन आश्चर्य कर रहे थे,और सोच रहे थे कि पत्नी सुशीला से क्या कहूँगा।मित्र ने खाली हाथ लौटा दिया।
गाँव पहुंचने पर अपनी झोपड़ी को न देख सुदामा को भारी चिंता हुई। झोपड़ी की जगह राजभवन खड़ा दिखाई दिया। कुछ देर बाद पत्नी सुशीला और बच्चों को सुंदर-सुंदर वस्त्रों और आभूषणों में देखकर सुदामा के चेतन मन में सारा रहस्य समझ में आ गया।
सुशीला पति को आनंदपूर्वक भवन के अंदर ले गई।
(पौराणिक कथा के आधार )
— निर्मल कुमार दे
