कविता

गाजा का एक बालक

कल
माँ की गोद मे बैठता था
बाप की कन्धे मे चढ्ता था
छोटी साइकल चढ्कर बाजार जाता था
कापी खरिदता था
बारुद की धूवाँ सुँघता था
देश खोने की बातें सुनता था
पर समझता नही था
स्वाभाविक ही है
वो बम–बारुद से डरता था
फिर भी
खेलता था
उछल–कूद करता था
नाचता था
बडे भाईका हाथ पकडे–पकडे
स्कूल जाता था
अब्दुल : गाजा का एक बालक !

वक्त बदला
आकाश अलग सा दिखा
मिट्टी ने नयी दुर्दशा भोगी
आज
माँ आकाश मे
बाप अलप
बडा भाई जख्मी
बस्ती धूल मे मिला हुआ
किताब गायब
स्कूल गायब
स्कूल की टिचर गायब
किधर जाए अब ?
किस के सँग जाए अब ?
पजल हुआ है अब्दुल
भीमल हुआ है बालक
सर के उपर छत के बदले आकाश
भागमभाग मे पहुचने की जगह है सेल्टर
वर्तमान की विदु्रपता मे कदम रख रहा है
अब्दुलः गाजा का एक बालक !

ओले बर्साता आकाश
चाँद सूरज द्वारा प्यार बर्साता आकाश
पलपल बमबारी कर रहा है
जब बम गिरता है
घर आग बनता है
जब विष्फोट होता है
घर घूल बनता है
त्यही धूल मे दब जाते है इंसान
जब बारुद बरसता है
हवा बिख बनता है
पानी गायब होता है
गाजा मे पग–पग पर
मिलते है युद्ध के सर्प
युद्ध के सर्प को
रस्सी समझकर पकडना चाहता है बालक
अब्दुलः गाजा का अबोध बालक !

कुछ समय से
पलपल ढह रही है घर
पलपल पडोसी गिरे
खुद की माँ गिर पडी
गिरी हुई माँ आकाश हो गई
स्कूल खण्डहर हो गया
कक्षा मे हँसा–हँसा के पढानेवाली
स्कूल की टिचर गायब हो गई
बस्ती उजड गई
बस्ती मरुभूमि होते वक्त
बस्ती सँग बालक सडक मे आ पहुँचा
अब्दुलः गाजा का बालक !

गाजा, अब्दुलकी पैर तले की मिट्टी
जीवन की जडें धँसी हुई मिट्टी
इतिहास की महक रचीबसी हुई मिट्टी
ये मिट्टी उब्जाउ थी
महनीय थी
पडोस की डोजर ने
आग से
क्षेप्यास्त्र से
बम से
मिट्टी निरंतर
आग हो रही है
धूलधानी हो रही है
राख हो रही है
अब्दुलने पेन्सिल से बनाया हुआ घर
इरेजर से मिटाया हुआ जैसा
इजरायली युद्ध से
ध्वस्त हो रही है गाजा की बस्ती
धूल मे मिल रही है गाजा का जीवन
सिकुड रहा है गाजा
उँची हो रही है लाशों की पर्वत
बढोत्तरी हो रही है विलुप्तों की सङ्ख्या
बमबारी मे
खुद भागे कि
घरों मे कुचले हुए लोगों को ढूँढे ?
बढ् रही है द्विविधा
गाजा मिटने के बाद
गाजा समाप्ति के बाद
मरने–मारने के लिए उद्यत होने के बावजूद भी
बचे हुए लोग किधर जाएगें ?
पता नही गाजाबासीयों को
पता नही गाजा के बालक अब्दुलको ।

एकतरफा संवाद है अब्दुलसँग मेरा
एकतरफा दिखना है अब्दुलसँग मेरा
कल पत्रकार मिल लेते थे उस से
और मैं स्क्रिन मे देखता था
अभी मन से देखता हुँ
बिनु भीख का कटोरा
बगैर आस्तिन का कमिज
अद्र्धनग्न
रोटी की कतार मे है वह
स्वजन खोकर
स्कूल खोकर
घर खोकर
सिर मे अरबी तेज धूप थापे
वह खडा है तप्त सडक में
पेटपूजा हेतु
नाइल नदी तुल्य लम्बी कतार मे है वह
भुखी कतार
बालक के लिए जगह नही छोड्ते
घायल को प्यार करने की धैर्यता नही दिखाते
‘पहले वृद्ध वृद्धाकी बारी’ फुरसद नही
युद्ध दबा रहा है उसको
लाइन कुचल रहा है उसको
अब्दुलः गाजा के बालक ।

युद्ध की नगरा बज रही विकट वक्त मे
भीमकाय संयुक्त राष्ट्र–संघ को
लाश गिनने से ही फुर्सद नही
पडोसी अंकल नेतान्याहुकी
गाजा समाप्ति के सिवा कुछ भी खयाल नही
फिर भी
अकुपाई करने के लिए बचे हुए जमीन मे
युद्ध के स्पोन्सरोें
रोटी बाँट रहे हैं
युद्ध का बिरोध करने मे असक्षम लोग
भात बाँट रहे है
किधर से घुसे पता नही ?
युद्ध नाचाहनेवाले उक्त मैदान मे
वह लोग भी चना–रोटी बाँट रहे है
गजबीला है युद्ध और दान का सम्बन्ध !
गजबीला है उन्माद और मानवता का अन्तद्र्वन्द्व !
कतार के साथ, सँग
धक्के खाते हुए/पिचकते हुए
धक्कमधुक्की मे आगे बढ रहा है अब्दुल
उसकी पेट की आग
उसकी मन की राख
उसकी स्कूल न जा पाने की छट्पटाहट
कौन लिखेगा ?
कौन देखेगा ?
सक्षम होता तो कतार से निकलकर
निर्भीकता के साथ खडा होता
अब्दुलः गाजा का बालक !

अब्दुलको पता नही है
मानव अधिकार चार्टर
विकसित देश मे हो रही फुसफुसाहट
मानवाधिकार का ढिंढोरा पिटनेवाला युरोप
उसने ही अपने हतियार को
गाजा मे घुसने के लिए दिए अधिकार
केवल अब्दुलने देखा, भोगा है
मिट्टी की गरमी
बस्ती का विनाश
भग्नावशेष मे परिणत हुए घर
खोए हुए अपने
क्षत–विक्षत स्कूल
बिनु पढाइ के बिते हुए कुछ महिने
और अंकल नेतान्याहुकी रौद्र नृत्य ।

गाजा मे रोया मानवता
गाजा मे गिरी बिजरी
इस विपत्ति मे
मन दुखाने और क्रोधित होने के सिवा
कुछ कर नही सके हम
युद्ध मे जीवित रहा तो
भागते–भागते कही ठहरकर
हमारी निरीहता पढा तो
क्या कहेगा ?
अब्दुल : गाजा का एक बालक !

— वासुदेव अधिकारी
काठमाण्डू, नेपाल

वासुदेव अधिकारी

काठमाण्डू, नेपाल adhikari.basudev99192@gmail.com