लघु कहानी- बोझ
सड़क पर धूप तप रही थी। पांवों के नीचे तपती मिट्टी, कंधों पर बोझ से भरे थैले और आँखों में थकान की परछाई। वह छोटा-सा बच्चा ठिठक-ठिठक कर चल रहा था। उसका शरीर तो नन्हा था, पर कंधों पर लदा बोझ किसी पहाड़ से कम न था।
गली के मोड़ पर बैठे कुछ लोग उसे देख रहे थे पर किसी ने आगे बढ़कर थामना जरूरी नहीं समझा।
उसकी आँखों में सवाल था- “क्या मेरी थकान किसी को दिखाई नहीं देती? क्या मेरे कंधों पर लदा बोझ सिर्फ कचरा है? इसमें तो मेरे परिवार की भूख, मेरी माँ की आँखों के आँसू और मेरे छोटे भाई की रोती हुई आवाज़ छिपी है। कोई क्यों नहीं समझता?”
वह बच्चा बोरा घसीटते-घसीटते मन ही मन बुदबुदाता— “मुझे खेलना था… किताब पढ़नी थी… दोस्तों के साथ दौड़ना था। पर नियति ने मुझे यहाँ भेजा है। इन गलियों में, इन कचरे के ढेरों में। लोग मुझे गंदगी में तलाशते देखते हैं, पर मेरी आँखों में छिपे सपनों को कोई नहीं देखता।”
उसकी नन्हीं हथेलियाँ कूड़े में बोतलें और रद्दी बीनतीं, मानो भविष्य के टुकड़े चुन रही हों।
हर बोतल बिककर शायद एक रोटी बन जाएगी। हर रद्दी के बदले घर में शायद माँ का चूल्हा जल उठेगा। वह सोचता है- “अगर मैं न होऊँ, तो घर में कौन रोटी लाएगा? कौन मेरे भाई-बहनों को भूख से बचाएगा? मेरी माँ के काँपते हाथ चूल्हा कैसे जलाएँगे?”
उसकी आँखें पलभर के लिए आसमान की ओर उठती हैं। बादलों के पीछे छिपे सूरज से मानो शिकायत करती हैं- “क्या मेरी उम्र इतनी बड़ी थी कि मुझे यह सब झेलना पड़े?”
लेकिन अगले ही पल वह बोझ फिर संभाल लेता है। उसके कदम लड़खड़ाते हैं, मगर गिरते नहीं।
उसकी मजबूरी ही उसकी ताकत है। इस दृश्य ने गली में खड़े सब लोगों को चुप कर दिया। वे जानते थे, यह बच्चा सिर्फ अपना बोझ नहीं ढो रहा, बल्कि हमारी संवेदनाओं पर भी सवाल उठा रहा है। क्या हमने सचमुच बच्चों को बचपन दिया है, या उनकी हंसी को कचरे के ढेर में दफना दिया है? यह कहानी उस बच्चे की नहीं, बल्कि हर उस मासूम आत्मा की है जो भूख और गरीबी के बोझ तले अपना बचपन खो देता है।
— डॉ. निशा नंदिनी गुप्ता
