गीत/नवगीत

नयी भोर

बस कहने भर को यह नयी भोर
लाखों घरों में है अंधियारा पुरजोर
प्रकृति के रौद्र रूप के सामने
हर इंसान दिखता बेबस, कमजोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

क्या पहाड़ और क्या मैदान
हर तरफ बस तबाही का मंजर है
पहाड़ बेतहाशा दरक रहे हैं और
बारिश का चलता अनवरत दौर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

यूं तो वर्षा सबके मन को भाती
धरती मां खुश होकर लहलहाती
लेकिन अति तो है सदा ही वर्जित
अब न नाच पाता मन का मोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

तीर्थ यात्राएं सब बंद पड़ी हैं
बहुतों के लिए संकट की घड़ी है
पर्यटन उद्योग पर है छाई विपदा
अंदर तक सबको दिया झकझोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

बादलों का यूं रह-रहकर फटना
क्यों हम मान रहे सामान्य घटना
पलक झपकते सब बिखर जाता
बर्बादी का नही कोई ओर-छोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

नदियां -नाले सब उफन रहे हैं
रोज नयी मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं
खेत-खलिहान सब पानी में डूबे
मुसीबतों के छाए बादल घनघोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

बारिश ने ऐसा उत्पात मचाया
हर तरफ बस एक कोहराम छाया
कितने ही घर जमींदोज हो गये
बस शेष रह गया शोक और शोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

हजारों लोगों ने अपने प्राण गंवाए
चेहरों पर उदासी के बादल छाए
प्रियजनों का रो-रो के बुरा हाल है
हलक से नीचे न उतरते कौर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

प्रकृति ने बदला लेने की है ठानी
बोली खूब कर ली तुमने मनमानी
अब तुम मेरी शक्ति को भी देखो
लेने न दूंगी तुझे कहीं भी ठौर
बस कहने भर को यह नयी भोर।

प्रकृति के रौद्र रूप के सामने
हर इंसान दिखता बेबस, कमजोर
बस कहने भर को यह नयी भोर।
बस कहने भर को यह नयी भोर ।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई