हिन्दी
नया परचम उठाना चाहती है।
नये जलवे दिखाना चाहती है।
फ़ज़ा अच्छी बनाना चाहती है।
सभी को साथ लाना चाहती है।
पुराना भी सुनाना चाहती है।
नया लेकिन फसाना चाहती है।
नये प्रतिमान गढ़ती रोज़ हिन्दी,
क्षितिजपर चमचमाना चाहती है।
फकत ये चाहती सम्मान पूरा,
किसी सेकब ख़ज़ाना चाहती है।
वतन हितकी जहाँहो रोज़ चर्चा,
वहीं जा सर नवाना चाहती है।
— हमीद कानपुरी
