ग़ज़ल
मिट्टी की मूरत को सजा रहे हो इतना जी,
प्रति – माँ के आँसू फिर क्यों बहाते हो?
कोख उजड़ रही , बेटियाँ तड़प रही यहाँ,
पर देवी गीत भी बड़े शान से क्यों गाते हो?
चौराहों में माताएँ भूख से तड़प रही हैं,
मंदिरों में पकवानों का ढेर क्यों सजाते हो?
झूठा है आडंबर, और यह भक्ति भी अधूरी है,
बेटी की अस्मत लूटने से क्यों नहीं बचाते हो?
प्रतिमा की पूजा से पुण्य न मिलेगा कभी,
प्रति माँ की सेवा से अगर मुँह तुम छिपाते हो।
— सोमेश देवांगन
