मिट रहा गांवों का नामोनिशान
भले ही बसते हैं बहुत कम लोग उसमें
पर पेड़ों से भरा बहुत सुंदर है मेरा गांव
जब मैं पढ़ता था अपने गांव के स्कूल में
नीचे होती थी टाट पट्टी ऊपर थी बट बृक्ष की छांव
पीने को मिलता है बौड़ी का स्वच्छ जल
बैलों के साथ चलता था खेतों में कभी हल
खेत खलिहान अब पड़े हैं सब वीरान
कड़कती धूप में कौन करे काम आराम में बीतता है हर पल
बौडी थी जो अब दब गई है जमीन के नीचे
नल के पानी का कर रहे दुरुपयोग आंखे मीचे
बून्द बून्द को तरसोगे जब नहीं मिलेगा पानी
दूसरों का बन्द करके पानी खुद क्यारियां सींचे
सड़क से था मेरा गांव बहुत दूर
अब तो सड़क पहुंच गई है घर द्वार
पैदल चलने को थे सब मज़बूर
पगडंडी पर भी पड़ गई अब वक्त की मार
अब तो पैदल नहीं चलते झट से टैक्सी हैं बुलाते
बस पगडंडी ही थी जिससे सब थे आते जाते
अब तो घर के अंदर ही बन गए हैं बाथ रूम
पहले बौड़ी और कुएं पर थे ताजे पानी से नहाते
पहले शहर के लोग देखने आते थे गांव
तब पीने को शुद्ध पानी और मिलती थी ठंडी छांव
अब तो कट गए पेड़ पहाड़ो के बन गए मैदान
धीरे धीरे शहर बढ़ रहे मिट रहा गांवों का नामोनिशान
— रवींद्र कुमार शर्मा
