मुझे अहमक ही रहने दो
भई पढ़ा लिखा हूं मैं
और तुम कहते रहे हो मुझे अनपढ़ गंवार,
क्योंकि मेरे इसी रूप से है तुझे प्यार,
गर मैंने बोल दिया सारी बातों का सार,
तक्षण पड़ सकते हो बुरी तरह बीमार,
आपकी हर झूठ,हर अदा का दीवाना रहा हूं,
तुम्हारी तो तुम्हारी खुद की नजर में भी
गधा और हकीकत से बेगाना रहा हूं,
यदि मैंने तर्क करना शुरू कर दिया,
आपके असत्यों पर सच का चादर भर दिया,
तो कर नहीं पाओगे अपनी मनमानी,
जो धंधा रहा है तुम्हारा खानदानी,
सब कुछ सुन रहा हूं चुपचाप
जिन्हें जो कहना है कहने दो,
हां अभी मुझे अहमक ही रहने दो,
जिस दिन मेरा बंद मुंह खुल गया,
जिस दिन मैं अपनी मनमानी पर तुल गया,
खत्म कर दूंगा तुम्हारा पाखंडवाद,
हो जिसके जरिये सदियों से आबाद,
अपने तर्कों से जब शुरू कर दूं उड़ाना
बोयी गई तेरे असत्यों की धज्जियां,
लग सकता है थोड़े से समय ज्यादा
हर कुतर्की कटेंगे जैसे हरी सब्जियां,
जिस दिन लाऊंगा जलजला
ढह जायेगा भरभरा तेरा गप्पों का पहाड़,
धू धू कर जलेंगी आस्था के भीतर
छुपे हुए सारे के सारे तेरा कबाड़,
बचपन से अब तक सब्र ही तो किया है
जरा सा और सब्र मुझे सहने दो,
हां अभी मुझे अहमक ही रहने दो।
— राजेन्द्र लाहिरी
