कविता

कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

जीवन अपना दांव लगाकर,
जग को शिक्षा क्या दे पाए तुम,
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय ! खुश रह पाए तुम?

कुंती का जाया होकर भी, सुत राधा का कहलाया,
कवच-कुंडल भूषित जनम कर, भाग्य दोष क्यों पाया?
कौन किया था पाप, तुमने?
सच जीते जी जग जान न पाया।

हाय अभागा मानकर खुद को,
छिपकर कितना रोए तुम।
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

परशुराम का शिष्य बनाकर,
अभिलाषा ने खेल खिलाया,
कुल जाति छुपाकर गुरु से,
तुमने छल छद्म अपनाया,
सेवा का फल तो मिला नहीं,
विस्मृत विद्या शाप भयानक पाया,

गुरु को छलकर, हे महारथी!
कितना हो पछताए तुम।
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम।

तुमने ही नहीं छल किया अकेले,
छलने तुमको, देव धरती पर आए,
विप्र वेश में तुमसे दानी,
कवच कुंडल मांगने आए,
देख इंद्र को हाथ फैलाए, तुम तनिक नहीं डगमगाए,
कवच कुंडल का दान देकर तुमने वचन निभाए,

प्रण की खातिर जीवन हारकर,
जग में खूब नाम कमाए तुम।
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रहे पाए तुम।

भरी सभा में लाज लुटी थी,
धर्म मूक बन सोया था।
नीति, न्याय सब बिक गए थे,
नियति ने अपराध बोया था।
क्षात्र धर्म के रखवाले भी,
मौन रह गए, कुछ न बोले,
राधेय! उस क्षण उपहास कर रहे,
कहां खड़े तुम, किसको तोले।

घृणित कर्म में भागी बनकर,
कभी खुद से आँख मिला पाए तुम?
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

कृष्ण ले चले तुम्हें अपने रथ पर,
जनम रहस्य भी खोला था।
सत्य-धर्म की राह दिखाकर,
रण रुकवाने को बोला था।
पर वचन तुम्हारा दृढ़ रहा,
मित्र धर्म से बंधा रहा मन,
दुर्योधन हित खड़े रहे समर्पित,
राधेय! तुम भी धर्म समान बन।

कृष्ण वचन को ठुकराकर,
क्या चैन कहीं पा पाए तुम?
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

माँ का रूप सामने आया,
पर ममता देर से जागी थी।
जो जगह न दे पाई आँचल में,
वो वाणी में अनुरागी थी।
कुंती बोली – “पुत्र! मुझे पहचानो,
अपने अनुजों से युद्ध न ठानो।”
“माँ! बहुत देर करदी तुमने आते आते,
मैं वचन से लौट न पाऊँ, जाते जाते।”

माँ की ममता को त्यागकर,
क्या खुद को समझा पाए तुम?
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

चक्रव्यूह में अभिमन्यु फँसा था,
धर्म का दीप वहाँ बुझा था।
एक क्षण को भी हृदय तुम्हारा,
दुःख से भरकर नहीं रोया था।
अनुज अर्जुन को प्रतिद्वंदी माना,
उसके पुत्र का रक्त बहाया,
धर्म-अधर्म की सीमारेखा का,
तब मन में क्यों सोच न आया?

कर्ण! उस क्षण का अपराध बोध,
क्या कभी मिटा पाए तुम?
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

रणक्षेत्र में भाई पर भाई,
बाणों की वर्षा कर रहा था।
एक ओर सखा, दूसरी ओर धर्म,
कर्ण बीच में जल रहा था।
रथ चक्र धँस गया धरा में,
कृष्ण ने संकेत दिलाया,
अर्जुन के बाणों ने तब,
राधेय का शीश झुकाया।

मरते दम तक वचन निभाया,
पर मन में क्या मुस्काए तुम?
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

जीवन अपना दांव लगाकर,
जग को शिक्षा क्या दे पाए तुम,
दुर्योधन का साथ निभाकर,
कहो राधेय! खुश रह पाए तुम?

— पुखराज छाजेड़