कविता

लोक कितने विलोके हम हैं गए!

लोक कितने विलोके हम हैं गए,
अकेले फिर भी हम हैं कितने रहे;
नज़ारे कितने तारे दिखलाए,
नज़र कीटाणु कितने गुण आए!

चुस्त औ चतुर हर कोई रहते,
सरिताएँ ज़िंदगी के सब बहते;
सृवित भी जब कभी हैं वे होते,
दृवित हो सृजन किए वे चलते!

संस्करण हर कोई अजब सा है,
व्याकरण व्यक्त हर विवेकी है;
स्वाद हर अपने शब्द कहता है,
अपने संस्कार प्रकट करता है!

विचित्र चित्र हर रचे चलता,
प्रकृति अपनी से प्रक्रिया करता;
बदलता हर घड़ी विश्व रहता,
दृष्टि अपनी को विहंगम करता!

चले युग कितने योग ना जाने,
यंत्र औ तंत्र सृष्टि ना समझे;
ध्यान ‘मधु’ प्रभु के पैठ जब पाए,
जीव जड़ की हरेक गति भाये!

— गोपाल बघेल ‘मधु’