गीत/नवगीत

गीत

करनी गर नेक रखेंगे तो फिर यूँ पछताना कैसा?
कुछ तो लोग कहेगे, बातों से डरजाना कैसा?

जीवन की आपधापी संघर्ष कहानी कहती।
संघर्षो के घेरों में नित नई कहानी बहती ।
सच की अंगुली थामी जब झूठों से घबराना कैसा ?
कुछ तो लोग कहेँगे……..

अविरल बहती धारा में नदियों सम बहते जाना।
जग में फैली कड़वाहट को अमृत तुल्य बनाना।
अनुपालन मर्यादा का हो तो फिर डरजाना कैसा?
कुछ तो लोग कहेँगे……..

झंझवातों के घेरे पग पग पर नए झमेले ।
अपराध श्वेतपोशो के नित बढ़ते नए नवेले।
हर भेद खुलासा करना है इससे अब
भयखाना कैसा ?
कुछ तो लोग कहेँगे……..

नफ़रत और भ्रष्टाचार बढ़ा भाई भाई में बैर बढ़ा।
दुर्जनता भारी हुई आज सज्जनता आज बिखरती है।
इनसे सबको लड़ना होगा भय खाकर मिट जाना कैसा?
कुछ तो लोग कहेँगे……..

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016