कविता

चाय ला री मेहरारू

नेताजी खुर खुर खांसते रहे,
महिलाओं की आजादी और वर्तमान स्थिति के
विषय में रोचक भाषण देने के लिए
मुद्दे और बातें रात भर तलाशते रहे,
स्वास्थ्य का ध्यान रख
सो जाने के लिए कहने पर
मेहरारू को खूब पीटा,
इस कमरे से उस कमरे घसीटा,
सख्त हिदायत दी कि
जब भी मांगा जाये चाय लाओगे,
वर्ना हश्र भूल नहीं पाओगे,
जागकर बस सोचते रहे नेता बीमारू,
हर घंटे आवाज लगाते चाय ला री मेहरारू,
चाय पी मगन हो जाते,
फिर भविष्य की सोच में खो जाते,
सुबह सुबह नौकरानी को डांटा,
कामचोर हो कह पारिश्रमिक काटा,
बेटी कॉलेज के लिए फीस मांग रही थी,
या कहें अपनी गर्दन में चाकू टांग रही थी,
भला बुरा उसने भी सुना,
पर कर गयी रोज की तरह अनसुना,
जब भाषण दिया तो
सब महिलाओं के दिलों में जाग गयी आस,
नेताजी हैं हम सबके लिए खास,
तकरीर का असर गया बहुत दूर,
दल वाले टिकट देने के लिए हो गये मजबूर,
इधर घर में वहीं रोज का चिकचिक
करने लगे सबसे बड़े महिला अधिकार सुधारू,
चाय ला री मेहरारू, चाय ला री मेहरारू।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554