माटी की महक
माटी की महक। गांव में रहते लोगों का भोलापन। लहलहाते खेत। गाय भैंस का रंभाना। बैलगाड़ी की सवारी। अमरूद, आम, जामुन…फलों के पेड।
अध्यापिका अपनी स्मृतियों में खोई-खोई हमें गांव के बारे में जानकारी दे रही थी।
” हमें ले चलो न गांव मैडम जी। कलरव करते पंछी, झरझर बहते झरने, कुल्हड में मसाला दूध, माँ के हाथों चूल्हे पर बने गरमागरम फुलके, भांप निकलती खीर, सिलबट्टे पर पीसी चटणी, चूल्हे पर सिंका पापड, चुरमा.. चलो… हम गांव चले..
अध्यापिका सरोजिनी जी ने तुरंत हामी भर दी। उनका मन पंछी कब गांव जा पहुंचा, उन्हे भी पता न चला। सारी व्यवस्था गांववालों ने कर दी थी। गांव में उनका अपना घर था। भाईचारा, प्यार-दुलार, स्नेहवर्षण की अनुभूति से सब उल्लसित थे।
सबकी उत्सुकता बढती जा रही थी। बच्चों ने माता जी को प्रणाम किया। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण का उद्घोष हुआ। अष्टभुजा माता रानी सी माँ फटाफट काम करती जा रही थी। चूल्हे पर रसोई? कैसे इतना काम करती होगी मां? रोटी, दाल साथ में हरीश प्याज. थे देसी खाना। मजा आ गया सबको। यथेष्ट भोजन कर सबने आराम किया।
तृप्त हो गया सबका मन।
गांव की ताजा हवा, पगडंडीया, प्रेमपूर्वक व्यवहार से सब अभिभूत थे। भारी मन से, मधुर स्मृति की गठरी ले, सब लौट पडे।
