ग़ज़ल
माटी से जुदा होकर रहना जीवन का खो जाना है
जीवन माटी में जीकर फिर माटी ही हो जाना है।
दौलत शोहरत हो कितनी भी पांव ज़मीं पर रहते हैं
ख्वाब में कितना भी उड़ लें वापस माटी में आना है।
जाने कितना कर्ज है मुझ पर माटी वाले आंगन का
सजदे में सर झुकता है माटी का कर्ज चुकाना है।
गुल बूटे नदियां और सागर हैं माटी की बाहों में
माटी को माटी मत समझो माटी अनमोल खजाना है।
कोई जुदा नहीं रह सकता माटी से जानिब,यही बताना है
जबसे हमने आंखें खोली अपना भी यहीं ठिकाना है।
— पावनी दिक्षित जानिब
