पुस्तक समीक्षा

अतीत का प्रामाणिक गवाक्ष : उन्हें याद करते हुए

संस्मरण में लेखक अपने समय के इतिहास को दर्ज करता है, परंतु वह इतिहासकार नहीं है I संस्मरण में लेखक का देखा और भोगा हुआ यथार्थ अभिव्यक्त होता है I लेखक जैसा देखता और अनुभव करता है उसे अपने संस्मरण में लिपिबद्ध करता है, लेकिन यह आत्मकथा से भिन्न विधा है I आत्मकथा में स्वयं के बारे में लिखा जाता है जबकि संस्मरण में समकालीन लेखकों, राजनेताओं, दार्शनिकों और यहाँ तक कि किसी सामान्य व्यक्ति अथवा घटना के बारे में अपनी अनुभूतियों का चित्रण किया जाता है I हिंदी के प्रख्यात कथाकार रूपसिंह चंदेल की सद्यःप्रकाशित संस्मरण पुस्तक ‘उन्हें याद करते हुए’ में अतीत के अनेक विस्मृत अध्यायों का उद्घाटन किया गया है I लेखक ने पुस्तक के ‘प्राक्कथन’ में संस्मरण के संबंध में लिखा है-‘संस्मरण का अर्थ होता है सम्यक स्मरण I पूर्व धारणा थी कि इसमें विशेष गुणों से युक्त किसी व्यक्ति को उसके गुणों के साथ स्मरण किया जाता है, लेकिन संस्मरण विधा के विकास के साथ संस्मरण में केवल उस व्यक्ति के विशेष गुणों को ही नहीं, बल्कि उसकी कमियों को भी उद्घाटित किया जाने लगा है I’ रूपसिंह चंदेल की चार संस्मरण पुस्तकें पहले ही प्रकाशित और चर्चित हो चुकी हैं जिनके नाम हैं-यादों की लकीरें, भूले बिसरे पल, यादों के सफ़र और यादों के आईने में I  ‘उन्हें याद करते हुए’ पुस्तक में चौदह संस्मरण संकलित हैं I इन संस्मरणों में हिंदी साहित्य की राजनीति, खेमेबाजी, छल-छद्म, साहित्यकारों की पीड़ा और हताशा का प्रभावशाली चित्रण किया गया है I पुस्तक के अधिकांश संस्मरण हिंदी के उन साहित्यकारों पर केन्द्रित हैं जिनसे संस्मरणकार का घनिष्ठ संबंध रहा है I इनमें से कुछ समकालीन साहित्यकार हैं तो कुछ अग्रज पीढ़ी के साहित्यकार हैं I इन संस्मरणों में विभिन्न साहित्यकारों के साथ किए गए पत्राचार और फोन वार्ता का भी सन्दर्भ दिया गया है I 

   लेव तोलस्तोय जैसा लेखक सदियों में कोई एक पैदा होता है जिसका लेखन जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है I ‘लेव तोलस्तोय’ शीर्षक संस्मरण में तोलस्तोय के बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को उजागर किया गया है I संस्मरण लेखक तोलस्तोय की प्रतिबद्धता और समर्पण से अधिक प्रभावित है जिस बात को उन्होंने स्वीकार भी किया है I चंदेल जी ने परिश्रमपूर्वक रूसी साहित्य का अनुवाद किया है I उन्होंने लेव तोलस्तोय, दॉस्तोएव्स्की आदि पर गंभीर कार्य किए हैं जिसकी झलक इस संस्मरण में मिलती है I तोलस्तोय का जीवन अनेक अंतर्विरोधों में भरा हुआ था I उनके विचार बदलते रहते थे I यौन संबंध के मामले में खुद पर उनका नियंत्रण नहीं था, लेकिन अपने बच्चों से उम्मीद करते थे कि वे विवाह नहीं करेंI इस संस्मरण में तोलस्तोय के विराट व्यक्तित्व से साक्षात्कार होता है जो मानवोचित दुर्बलताओं से ग्रस्त है I पुस्तक का दूसरा संस्मरण डॉ शिवप्रसाद सिंह पर केंद्रित है I डॉ शिवप्रसाद सिंह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे I महाकाव्यात्मक गरिमा से युक्त उनके उपन्यास ‘नीला चाँद’, ‘कोहरे में युद्ध’, ‘दिल्ली दूर है’, ‘अलग अलग वैतरिणी’,‘गली आगे मुड़ती है’ और ‘शैलूष’ हिंदी साहित्य की अनुपम उपलब्धि हैं I संस्मरणकार ने डॉ सिंह के कोमल पक्षों और निश्छल व्यक्तित्व का जीवंत चित्रण किया है I उनके व्यक्तित्व की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो हिंदी के अन्य लेखकों से उन्हें अलग करती हैं I डॉ. सिंह ने एक तपस्वी की तरह वर्षों तक साधना और अनुसंधान किया I उसके बाद ‘नीला चाँद’, ‘कोहरे में युद्ध’ आदि उपन्यासों का सृजन किया I डॉ.शिवप्रसाद सिंह ने जिस विधा को स्पर्श किया वह विधा उनकी लेखनी से निहाल हो गई I ऐसा युगपुरुष भी हिंदी साहित्य में चल रहे घात-प्रतिघातों और पीली पत्रकारिता से अविचल नहीं रहा सका I हिंदी के मठाधीशों ने योजनाबद्ध रूप से उनके विरुद्ध साजिश की जिसकी चर्चा उन्होंने लेखक को लिखे अपने पत्र में की थी-

   ‘षड्यंत्र का केंद्र हमेशा एक रहा है I वह तभी शुरू हो गया जब मैं काशी हि.वि. में आया-तीखा उसी दिन हुआ जब बी.ए. के छात्र की कहानी 1951 के ‘प्रतीक’ के अक्तूबर अंक में छपी और उसकी प्रशंसा में नवंबर अंक में वात्स्यायन जी ने टिप्पणी लिखी-जलन की शुरूआत वहीं से हुई-फिर नीचे गिराने के षड्यंत्र शुरू हो गए I’ हिंदी में गिरोहबंदी, षड्यंत्र और दुष्प्रचार का खेल शायद हमेशा से चलता रहा है I इन सब प्रपंचों से दुखी होकर हिंदी के निर्माता और ‘हिंदी शब्दानुशासन’ जैसी तीन दर्जन से अधिक कालजयी कृतियों के महान लेखक आचार्य किशोरी दास वाजपेयी ने ‘जिंदगी और मौत के दस्तावेज’ शीर्षक लेख में अपने दर्द का बयान करते हुए लिखा है-‘इतना काम करने में मुझे लोहे के चने चबाने पड़े । कहीं कोई चर्चा नहीं, परीक्षाओं में लगना तो दूर की बात । मेरी सभी पुस्तकों की दो-दो प्रतियाँ सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में भेजी जाती रहीं, पर कभी किसी ने किसी भी पुस्तक का जिक्र नहीं किया । मेरे बारे में और मेरी साधना के बारे में अब तक केवल दो विद्वानों के लेख प्रकट हुए हैं । वे हैं-महापंडित राहुल सांकृत्यायन और डॉ. रामविलास शर्मा । इससे पुस्तकों का प्रचार न हो सका और मैं सदा अर्थ संकट में रहा ।‘ डॉ. शिवप्रसाद सिंह के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आया I उनके दो पुत्र असमय काल कवलित हो गए, लेकिन जब उनकी पुत्री मंजुषिमा की मृत्यु हुई तो वे टूट गए I धीरे-धीरे वे सद्मे से उबरे और संपूर्ण ऊर्जा समेटकर लिखना आरंभ किया I वे ऊपर से कठोर, लेकिन अंदर से कोमल थे I उनकी निश्छलता का लोगों ने अनुचित लाभ भी उठाया I यह संस्मरण बहुत मर्मस्पर्शी और कोमल प्रसंगों से भरा हुआ है I डॉ. सिंह के प्रति संस्मरणकार के मन में आदर और अनुराग का भाव है जो उनकी लेखनी से प्रकट होता है I

   ‘राजेन्द्र यादव को याद करते हुए’ शीर्षक संस्मरण में लेखक ने अपने जीवन संघर्ष के बारे में लिखा है-‘सुकून क्या होता है मैंने आज तक नहीं जाना I मेरे लिए वे दिन कुछ अधिक ही परेशानी भरे थे I नौकरी के तनाव के साथ घर के तनाव-लेकिन आश्चर्यजनक सच यह है कि उन तनावों के बीच न केवल अधिक लिखा जा रहा था, बल्कि महत्वपूर्ण पढ़ भी रहा था I’ राजेन्द्र यादव एक कुशल सम्पादक और चिंतक थे I उनके संपादन में प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘हंस’ के अंक उनके संपादन कौशल और नीर-क्षीर विवेक के साक्षी हैं, लेकिन उनमें कुछ कमजोरियाँ भी थीं जिसकी ओर संस्मरणकार ने संकेत किया है-‘हंस के प्रारंभिक दौर के बाद जिस प्रकार राजेन्द्र जी कुछ लोगों से घिरते गए थे उससे हंस की उत्कृष्टता प्रभावित हुई थी।  उन्हें घेरने वालों में महिला कथाकारों की संख्या अधिक थी I’ पुस्तक का चौथा संस्मरण कमलेश्वर पर केन्द्रित है जिसका शीर्षक ‘शब्दों के जादूगर कमलेश्वर’ है I सचमुच कमलेश्वर शब्दों के जादूगर थे I उनकी लेखनी के स्पर्श से सामान्य शब्द भी बोलने लगते थे I उनकी उदारता के संबंध में लेखक ने लिखा है-‘हिंदी में दूसरा कोई लेखक इतना उदार मुझे नहीं मिला, जितना कमलेश्वर जी थे I यदि कोई उदार रहा भी तो वह उनकी जैसी सक्षम स्थिति में नहीं रहा होगा I दरअसल दूसरों का कष्ट उन्हें अपना लगता था I’

   हिंदी साहित्य के उन्नयन में मधुरेश का उल्लेखनीय योगदान है I संस्मरणकार के साथ मधुरेश का पत्राचार होता था I मधुरेश लेखक के सभी पत्रों के उत्तर देते थे I ‘कर्मठ आलोचक मधुरेश’ शीर्षक संस्मरण मधुरेश जी के व्यक्तित्व पर केंद्रित है I ‘शीर्ष से सतह तक की यात्रा’ एक मार्मिक संस्मरण है I अक्सर लेखक प्रकाशकों की शिकायत करते हैं, लेकिन इस संस्मरण में रेखांकित किया गया है कि जो प्रकाशक लेखक की कीर्ति को दिग्दिगंत पहुँचाता है उस प्रकाशक को भी लेखक भूल जाते हैं और उसकी कोई खोज-खबर नहीं लेते I पराग प्रकाशन के मालिक श्रीकृष्ण जी ने अनेक लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित की थीं और हिंदी साहित्य में लेखक को स्थापित करने में भूमिका निभायी थी, लेकिन जब उनके बुरे दिन आए तो सभी साहित्यकार उन्हें भूल गए I श्रीकृष्ण जी ने अपने मन की वेदना प्रकट करते हुए कहा-‘जिस-जिस की भी अपने भले दिनों में खूब मदद की थी उनमें से कोई भी मिलने नहीं आया I किसी और की क्या कहूँ, खुद मेरा सगा भाई भी अभी तक मुझे देखने नहीं आया है I ठीक ही कहा है कि जो पेड़ कितने ही परिंदों को आश्रय और पथिकों को छाया व फल देता है, बुरे वक्त में वे सब उसका साथ छोड़ जाते हैं I’

   कोरोना वायरस जैसा विश्वव्यापी संकट पहले कभी नहीं आया था I विश्व के विकसित और संपन्न देश भी इस संकट से निपटने में नाकाम साबित हुए थे I इटली, अमेरिका, ब्रिटेन, ईरान आदि विकसित देशों में मौत बनकर यह लोगों को अपनी चपेट में ले रहा था I मानव जाति के सामने अभूतपूर्व संकट उपस्थित हो गया था I इस वायरस की चपेट में आकर लाखों लोग असमय ही काल कवलित हो गए थे I नरेन्द्र मोहन और रमेश उपाध्याय पर लिखते हुए भूमिका स्वरूप ‘कोविड में जो साथ छोड़ गए’ शीर्षक छोटी-सी टिप्पणी में संस्मरणकार ने उन सभी लेखक मित्रों का स्मरण किया है जिनका निधन कोविड महामारी के दौरान हो गया I  विष्णुचन्द्र शर्मा, कवि विजेंद्र, नरेंद्र कोहली, कुँवर बेचैन, नरेंद्र मोहन, बद्रीसिंह भाटिया, रमेश उपाध्याय आदि को इस महामारी ने निगल लिया था, जिन्होंने अपनी सशक्त लेखनी से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है I रमेश उपाध्याय वामपंथी विचारधारा के चर्चित कथाकार थे I उन्होंने कम्पोजीटर के रूप में अपनी जीवन-यात्रा आरंभ की थी और अपने संघर्ष के बल पर प्रोफ़ेसर के पद तक पहुँच गए थे I ‘रमेश उपाध्याय’ शीर्षक संस्मरण में लेखक ने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष को अभिव्यक्त किया है I रूपसिंह चंदेल का मानना है कि वामपंथी होते हुए भी रमेश उपाध्याय उदार थे I

   डॉ नरेंद्र मोहन ने मंटों की सम्पूर्ण रचनावली का संपादन किया था I उन्होंने कविता, आलोचना, डायरी, जीवनी और नाटकों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया I संस्मरणकार ने डॉ. नरेंद्र मोहन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-‘उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था I एक बार मिलने के बाद कोई भी उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह सकता था I उनकी मुस्कान बहुत ही मोहक थी जिसमें सामने वाले के प्रति एक प्रकार की आत्मीयता का भाव होता था I’ डॉ माधव सक्सेना ‘अरविन्द’ पर केन्द्रित संस्मरण में संस्मरणकार ने ‘कथाबिंब’ पत्रिका के प्रति अरविन्द जी के अनुराग और समर्पण का उल्लेख किया है I इस संस्मरण में अरविन्द जी के कई पत्रों को शामिल किया गया है I उन पत्रों के द्वारा अरविन्द जी के व्यक्तित्व और साधना का पता चलता है और यह भी ज्ञात होता है कि वे ‘कथाबिंब’ को अपनी तीसरी पुत्री मानते थे I पुस्तक का अंतिम संस्मरण ‘इतिहास की एक उदास ग़ज़ल’ मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर पर केन्द्रित है I इस संस्मरण में बहादुर शाह ज़फर की बेचारगी के साथ-साथ देश की तत्कालीन परिस्थितियों का रोचक वर्णन किया गया है I बादशाह बहादुर शाह ज़फर गज़ल  लिखते थे और उन ग़ज़लों में जीवन की सच्चाई को रेखांकित करते थे I वे एक अच्छे शायर थे और शायरों का सम्मान भी करते थे I इसलिए संस्मरणकार ने बहादुर शाह ज़फर को मुग़ल सल्तनत का उजड़ा हुआ नूर कहा है I जफ़र हिंदुओं की भावनाओं का आदर करते थे और हिंदू त्योहारों में शामिल होते थे I रूपसिंह चंदेल ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘उन्हें याद करते हुए’ में ईमानदारीपूर्वक उन प्रसंगों, घटनाओं और पत्रों का उल्लेख किया है जिससे संबंधित साहित्यकारों के व्यक्तित्व की विशेषताएं और कमियाँ उजागर होती हैं I पुस्तक रोचक व पठनीय है तथा पाठकों में जिज्ञासा का संचार करने में समर्थ है I    

पुस्तक-उन्हें याद करते हुए

लेखक-रूपसिंह चंदेल

प्रकाशक-लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली

संस्करण वर्ष-2025,पृष्ठ-168,मूल्य-350/- (पेपर बैक)

*वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम+पोस्ट-जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :1.अरुणाचल का लोकजीवन 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य 3.हिंदी सेवी संस्था कोश 4.राजभाषा विमर्श 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय 6.हिंदी : राजभाषा, जनभाषा,विश्वभाषा 7.पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत 8.असम : लोकजीवन और संस्कृति 9.मेघालय : लोकजीवन और संस्कृति 10.त्रिपुरा : लोकजीवन और संस्कृति 11.नागालैंड : लोकजीवन और संस्कृति 12.पूर्वोत्तर भारत की नागा और कुकी–चीन जनजातियाँ 13.उत्तर–पूर्वी भारत के आदिवासी 14.पूर्वोत्तर भारत के पर्व–त्योहार 15.पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक आयाम 16.यतो अधर्मः ततो जयः (व्यंग्य संग्रह) 17.मणिपुर : भारत का मणिमुकुट 18.उत्तर-पूर्वी भारत का लोक साहित्य 19.अरुणाचल प्रदेश : लोकजीवन और संस्कृति 20.असम : आदिवासी और लोक साहित्य 21.मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य 22.पूर्वोत्तर भारत : धर्म और संस्कृति 23.पूर्वोत्तर भारत कोश (तीन खंड) 24.आदिवासी संस्कृति 25.समय होत बलवान (डायरी) 26.समय समर्थ गुरु (डायरी) 27.सिक्किम : लोकजीवन और संस्कृति 28.फूलों का देश नीदरलैंड (यात्रा संस्मरण) I मोबाइल-9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com