रहस्यदर्शी विचारक ओशो
शुरुवाती दिनों में चन्द्रमोहन नाम से दर्शन में रूचि हो जाने पर ओशो, घर बार छोड़ अलग अलग धर्म और विचार धारा पर पूरे देश में जब प्रवचन देना शुरू किया तब लोग उन्हें आचार्य रजनीश के नाम से जानने लगे । लेकिन नवसन्यास आन्दोलन शुरुआत करने के पश्चात उन्होंने स्वयं ही अपने को “ओशो” कह प्रचारित कर दिया।
अब अति संक्षेप में इनके एक प्रवचन का सार साँझा कर रहा हूँ जिसमें ओशो ने बताया कि मृत्यु को ठीक तरह दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्हें देख कर जाना जा सकता है।
प्रारब्ध पर वे आगे बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है यानि मृत्यु आने से नौ महीने पहले ही कुछ ऐसी घटनायें होने लगती हैं जो इस बात का संकेत देती है। और यह प्रक्रिया बहुत ही सुक्ष्म होती है जिससे हम समझ नहीं पाते हैं क्योंकि साधारणतया हम जागरूक नहीं होते हैं।
प्रक्रिया को समझाते हुए उन्होंने कहा कि गर्भधारण व जन्म के बीच जो समय का अन्तराल है उतना ही समय मृत्यु को जानने का रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति में इसमें थोड़ी भिन्नता होती है। अगर कोई व्यक्ति गर्भ में नौ महीने रहने बाद जन्म लेता है, तो उसे नौ महीने पहले मृत्यु का आभास होगा। अगर कोई दस महीने गर्भ में रहता है तो उसे दस महीने पहले मृत्यु का अहसास होगा, कोई सात महीने पेट में रहता है तो उसे सात महीने पहले उसे मृत्यु का एहसास होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भधारण और जन्म के समय के बीच कितना समय रहा।
उन्होंने आगे बताया मृत्यु के ठीक उतने ही महीने नाभि चक्र में कुछ होने लगता है यानि क्लिक होना ही पड़ता है। इसका मतलब है कि गर्भ में आने और जन्म के बीच नौ महीने का अन्तराल था : जन्म लेने में नौ महीने का समय लगा, ठीक उतना ही समय मृत्यु के लिए लगेगा। इसलिये जो लोग जागरूक हैं, सजग हैं, वे तुरन्त जान लेंगे कि नाभि चक्र में कुछ टूट गया है; और अब मृत्यु निकट ही है।
अन्त में बताना चाहता हूँ कि ‘ध्यान’ पर उन्होंने कई प्रयोग किये । एक सर्वेक्षण में उन्हें पिछली शती के १०० उन विशिष्ट ब्यक्तियों में माना गया है जिनमें आम जनता को बहुत प्रभावित करने की क्षमता रही है।
आज उनकी पुण्य तिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
— गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
