संयुक्त परिवार और बच्चे
विश्व में वसुधैव कुटुंबकम् का भाव केवल भारत रखता है अन्य देश नही।भारत में रहने वाले हर भारतीय नागरिक में यह भाव होता है। छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है “जइशे जइशे घर द्वार तइशे तइशे फैरका अउ जइशे जइशे दाई ददा तइशे तइशे लइका। अर्थात यह भाव हमें हमारे पूर्वजों से जीन स्वरूप विरासत में हमें मिला है। वसुधैव कुटुंबकम् का भाव हमारे सनातन संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पहचान है। संयुक्त परिवार हमारे भारत के परिवार संरचना का आधार है। संयुक्त परिवार का हमारे सनातन संस्कृति को आगे बढ़ाने में महंती योगदान होता है। बहुत सारी ऐसी परंपरागत बातें है जिसका पालन हम समय अभाव या अन्य कारणों से नहीं कर पाते। पर यदि हम संयुक्त परिवार में निवास करतें है तो उस परंपरा का निर्वाहन हम सहज रूप से बड़ों के साथ कर लेतें हैं।
एक संयुक्त परिवार में मां बाप दादा दादी चाचा चाची ताई ताऊ सब होतें है। जिसमें एक बच्चें को बड़े बुजुर्गों का स्नेह और उनके तजुर्बा मिल जाता है। बड़े बुजुर्गों का तजुर्बा बच्चों के लिए प्रेरणादायक, प्रेरणास्रोत और जीवन में सीख देने वाली होती है। पर आज हमारा परिवार बिखराव की ओर अग्रसर है।आज हमारी मानसिकता “हम दो हमारे दो” वाली हो गई है और यही बात हमारे संयुक्त परिवार को तोड़कर एकल परिवार को जन्म दे रहा है।एकल परिवार में बच्चों को बड़े बुजुर्गों का सानिध्य प्राप्त नहीं होता है।फिर बच्चें कहां से प्रेरणादायक कहानी और गीत सुनेंगे कहां से उनके मन में पराय के प्रति प्रेम और वसुधैव कुटुंबकम् का भाव जागृत होगा।
संयुक्त परिवार से बच्चें को केवल सकारात्मक संस्कार ही नही बल्कि जीवन जीने की कला और हालात से लड़ने की ज्ञान प्राप्त होती है, क्योंकि उनके द्वारा बताई गई बातें कोई काल्पनिक या कहानी नहीं होती बल्कि जीवन का उनका एक अनुभव होता है। संयुक्त परिवार में बच्चों को विशेष संरक्षण भी प्राप्त होता है।संयुक्त परिवार की समाज और राष्ट्र निर्माण में महंती भूमिका होती है। एक घर या परिवार को चलाने के लिए अर्थ की भी आवश्यकता होती है तो यदि परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होगा तो उसमें से कुछ अर्थ के लिए तो कुछ समाज के लिए तो कुछ राष्ट्र के लिए कार्य करेगा।
आज कितने अरमानों के साथ मां बाप बच्चों का परवरिश करता है। पढ़ता है लिखाता और एक मुकाम तक पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ता है, यह बात वह बच्चा भलिभांति जानता है फिर भी विवाह उपरांत मां बाप का उपेक्षा प्रारंभ कर देता है। अपने ही संतान को अपने दादा दादी के प्रेम व संस्कार से वंचित कर देता है।जाहिर सी बात है यह स्वभाव उसके बच्चे के मन में भी देर सबेर पनपेगा क्योंकि बच्चा इस बात का अवलोकन कर रहा है। आज सब कुछ होते हुए भी मां बाप वृद्धाश्रम जाने को मजबूर हो रहें है।आज हम विकास की बात करते है और भौतिक विकास हो भी रहा है इसमें कोई संदेह नहीं है। पर विचारणीय बात यह है की आज जगह जगह वृद्धाश्रम खुल रहा है। यह बात प्रमाणित करता है की कहीं ना कहीं हम अपने नैतिक जिम्मेदारी से जी चुरा रहें हैं। हम वसुधैव कुटुंबकम् की बात करते है और हम अपने ही परिवार को नहीं जोड़ पा रहे है। अंग्रेजी में एक कहावत है “Unity is the power” अर्थात एकता में शक्ति है, और जो शक्ति एकता में निहित है ओ विभाजन में नहीं।हम अपने परिवार को संगठित रखेंगे तभी हम समाज को राज्य को और राष्ट्र को संगठित रख पाएंगे,और हम एक पूर्ण विकसित राष्ट्र की सपना को साकार को रूप दे पायेंगे।
— लक्ष्मीनारायण सेन
