क़लमकार
ए क़लमकार कहाँ सोई तेरी झक्कास रोशनाई !
कड़क दमदार जनता की आवाज़!
तुम!
औरों की तरह तो नहीं हो सकता कभी भ्रस्ट त्रस्त या लाचार!
उठ ! अमावस की रात में चाहे जुगनू सा जल!
पर जल!
जिससे तेरे आलोक में आगे बढ़ सके सच का आकाश!
और ला सके सूरज और उसका प्रकाश!
पर जो तू ही डगमगा गया ! डर गया !
या मौत से पहले मर गया!
तो भला बता!
कौन सूरज को दिखायेगा नई धरती या नया आकाश!
— गणेश दत्त गौतम
