कविता

क़लमकार

ए क़लमकार कहाँ सोई तेरी झक्कास रोशनाई !
कड़क दमदार जनता की आवाज़!
तुम!
औरों की तरह तो नहीं हो सकता कभी भ्रस्ट त्रस्त या लाचार!
उठ ! अमावस की रात में चाहे जुगनू सा जल!
पर जल!
जिससे तेरे आलोक में आगे बढ़ सके सच का आकाश!
और ला सके सूरज और उसका प्रकाश!
पर जो तू ही डगमगा गया ! डर गया !
या मौत से पहले मर गया!
तो भला बता!
कौन सूरज को दिखायेगा नई धरती या नया आकाश!

— गणेश दत्त गौतम

गणेश दत्त गौतम

पिता- स्व शंभू दत्त गौतम माता- स्व. श्रीमती ललिता ज.ति. - 06-07-1967 अभिरुचि हिंदी - कविता एवं गीत लेखन सम्प्रति- इंस्पेक्टर (विशेष संक्रिया) फ्रंटियर मुख्यालय, बीएसएफ, भिलाई (छत्तीसगढ़) में सेवारत निवास-- ग्राम पिपरिया, उमरिया, मप्र मो.नं.-- 9462495285