कविता

तुम्हारी यादें भी

मकड़ियां खाते हैं
जन्मते ही…,
जन्म देने वाले को भी
खा जाते हैं…
खाने के लिए ही जन्मा है ये
मकड़ियां खाते रहते हैं…

मन की बातें भी
मकड़ियां जैसी ही होती है
मन में खेलती रहती है
मन को ही खाती रहती है…

कहने को तो…,
तुम्हारी यादें भी
मकड़ी के बराबर की है
धड़कन के भीतर बसी होती है
धड़कन को ही खाती रहती है…

— मनोज शाह मानस

मनोज शाह 'मानस'

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