खुद की सुध
गाँव के आख़िरी छोर पर मिट्टी की दीवारों वाला एक घर था,उसी में रहता था हरिहर तीन बीघा बंजर-सी ज़मीन, एक जोड़ी बैल, और आँखों में हमेशा टिके रहने वाला हिसाब,यही उसकी एक अपनी दुनिया थी। हरिहर गरीब था, पर बेईमान नहीं मेहनती था, पर किस्मत से अक्सर रूठा हुआ।
पिछले अकाल में बीज के लिए उसने गाँव के साहूकार से सूद पर कुछ रुपये लिए थे, सोचा फसल होगी तो चुका दूँगा साहूकार मुस्कुराया वही मुस्कान जिसमें कर्ज़ की रस्सी में पहले से सुद बंधी रहती है। फसल आधी हुई, दाम और आधे मूल तो दूर, सूद भी पूरा न चुक सका, अगले साल फिर वही बीज, खाद, दवा सब सूद पर। हरिहर अब खेत में नहीं, काग़ज़ के अंकों में हल चलाने लग गया था।
सुबह उठते ही वह अपने शरीर की नहीं, सूद की सुध लेता। बैल को चारा कम, साहूकार को पैसा पहले। उसी समय उसकी पत्नी रमा बोली आज दवा ले आना, खाँसी बढ़ गई है। हरिहर ने सिर हिलाया, पर ज़ब घर लौटा तो जेब में दवा नहीं, हिसाब का कागज भरा था। बेटे की स्कूल-फीस आई तो उसने खेत का कोना गिरवी रख दिया और सोचा पढ़ लिख लेगा तो हमारी हालत सुधरेगी और खुद की सुध फिर से टल गई।
दिन बीतते गए हरिहर का बदन सूखता गया, आँखों के नीचे काले घेरे गहरे होते गए। खेत में वह कमर झुकाकर चलता शायद आदत थी, या सूद का बोझ,एक शाम लौटते वक्त चक्कर आया पड़ोसी रामू ने संभाला और बोला हरिहर भाई जाओ डॉक्टर को दिखा आओ पर हरिहर हँसा और बोला पहले सूद उतर जाए, फिर मैं अपनी सुध लूंगा। उसी रात बारिश आई कच्ची छत टपकने लगी। रमा ने पुरानी बाल्टी रखी, हरिहर ने खटिया खिसकाई पानी की टप-टप में उसे लगा जैसे सूद की किश्तें गिर रही हों एक-एक बूँद, अंतहीन। सुबह साहूकार आया और हिसाब खोला तब हरिहर ने अपनी जेब टटोली पर कुछ नहीं निकला, साहूकार ने कहा हरिहर अगली फसल तक इंतज़ार पर सूद और बढ़ेगा यह कहकर वह चला गया,और हरिहर वहीं बैठा रह गया।
हरिहर के आँखों में सूद बस दिखाई दे रहा था मायूस चेहरा सर झुका हुआ पर उसी दिन बेटे का रिपोर्ट कार्ड आया वह कक्षा में प्रथम स्थान था, काकी ने वह रिपोर्ट कार्ड चमकती आँखों से पढ़ा हरिहर ने काग़ज़ हाथ में लिया, पर अक्षर धुँधले थे,सीने में जलन उठी और वह उठा, दो कदम चला, और गिर पड़ा गाँव के लोग इकट्ठा हुए, डॉक्टर ने कहा कमज़ोरी नहीं ये तो लापरवाही है, हरिहर ने समय पर न दवा ली न भोजन यह सुनते ही रमा रो पड़ी। हरिहर की आँखें खुलीं और उसने धीमे से कहा मेरी सुध… किसी ने ली…?
फिर मुस्कुराया और शांत हो गया जैसे कोई लंबा हिसाब बंद हो गया हो। कुछ महीनों बाद पंचायत बैठी साहूकार का सूद माफ़ हुआ ज़मीन वापस मिली रमा खेत में खड़ी होकर हरिहर की पगडंडी देखती रही यह वही पगडंडी थी जहाँ हरिहर चलता था, खुद को भूलकर।
अब अक्सर गाँव में यहीं कहानी कही जाती है कि कर्ज़ केवल पैसे का नहीं होता कभी-कभी आदमी अपनी ही सुध सूद पर चढ़ा देता है। और जब हिसाब समझ आता है, तब तक जीवन की फसल कट चुकी होती है।
— सोमेश देवांगन
