कविता

सबक

सबक क्या कहता है सुनियेगा?

मेरी हर बात पर प्रश्न चिह्न लगाया गया
मेरी हर धड़कन को बेज़ुबां दबाया गया।
कभी मेरे चलने पर कभी मेरे बोलने पर
संघर्षित क्षणों के ज़ख्मों को भुलाया गया।।

हर सबक क्या कहता है सुनियेगा?

वर्षों बीत गए ढेरों अनुभव करते – करते
जी लिए दिल के ज़ख्मों को भरते -भरते।
छोड़ दिया रहम करना इन झूठी सांसों पर
भूल गए थे खुद को ये भ्रम पालते – पालते।।

हर सबक क्या कहता है सुनियेगा?

हर पाठशाला में तोड़-मरोड़ की भावना
कौन सी सामाजिक इकाई को है लगाना।
मेरे संस्मरणों को याद करना उस पथ पर
जहां जख्मों पर आता हो मरहम लगाना।।

हर सबक क्या कहता है सुनियेगा?

सुबह से झांझ तक जो सबक सीखा है
ज़हर के घूंट पी- पीकर जीना सीखा है।
प्रश्न चिह्न लगे हैं तकदीर के हर पन्नों पर
अनुभवों की साख को झड़ते हुए देखा है।।

हर सबक क्या कहता है सुनियेगा?

रिश्तों के अधूरे अलंकरणों से सजे हुए
कितने बेखबर थे हम ये भ्रम लिए हुए।
गुलाब की मुस्कुराहटें कांटों की सेज पर
जी रहे हैं हम सच के झूठे तीर सहेजे हुए।।

हर सबक क्या कहता है सुनियेगा?

बेखबर है हर वो सबक सिखाने वाला
जिसने देखा नहीं मेरे संघर्ष का निवाला।
थे कुछ वो अनजाने फ़रिश्ते उन राहों पर
जिनकी याद दिलाता हर पल बंशी वाला।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)