कविता

महंगाई की पाठशाला

घर में आर्थिक तंगी, बाहर महँगाई का शोर,
रोटी पहले सोचे घर, फिर सपनों की ओर।
महँगी हो रही शिक्षा, अब सस्ती होती नींद,
किताबों के बोझ तले दबती बचपन की चीख।

पिता की आँखों में थकान,हाथों में कर्ज़ का भार,
दिन भर घिसते हालात से , टूटता हर इतवार।
माँ की चुप्पी चीख बन , चूल्हे में जलती जाए,
बच्चे की स्कूल फ़ीस तले, ममता भी हार जाए।

ट्यूशन बने मजबूरी पर ये नहीं हमें स्वीकार,
जेब से पहले सपनों पर, चल करता है वार।
कॉपी-किताब नहीं यहाँ, उम्मीदें बिक जाती,
कक्षा से पहले मन में, हार-जीत लिख जाती।

बड़े स्कूलो की चमक, ये लूट बड़ा सलीकेदार ,
नाम “गुणवत्ता” रखकर,शोषण का व्यापार ।
साल में रंग बदल ड्रेस,फिर बढ़ जाती फ़ीस,
माता-पिता की मजबूरी, फिर भी देते आसीस।

बदलते नियमों की फाइल, उलझता हुआ सवाल,
काग़ज़ पूरे गर न हों तो, बच्चों के सपने बेहाल।
लाइन में खड़ा बचपन पूछे, झुकाए हुए अब सिर,
कहे पढ़ना गुनाह तो नहीं, आँखों से बहता नीर।

— सोमश देवांगन

सोमेश देवांगन

गोपीबन्द पारा पंडरिया जिला-कबीरधाम (छ.ग.) मो.न.-8962593570