मांडवी बोल उठी
जनकनंदिनी सीता कहलायी,
उर्मिला की साधना भी गायी,
पर मेरे हिस्से मौन रहा
मैं थी, मैं हूँ, पर कहीं न बतायी।
भरत का संग था संकल्प,
उनका वनवास मेरा भी तप,
मैंने भी रत्नजटित सुख त्यागे,
पर मेरे व्रत पर न श्रवण हुआ,
न कोई कथानक रचा गया।
राजमहल का हर कोना पूछे
क्या प्रेम की परिभाषा मैं नहीं?
क्या मेरी प्रतीक्षा अनाम रही,
क्या स्त्री वही, जो सीता कही?
उर्मिला ने लक्ष्मण को समझा,
विरह में भी स्नेह बरसाया,
मैंने भी हर क्षण भरत की पूजा,
पर मेरी पीर को शब्द न पाया।
ना चित्रकूट गई, ना वन-पथ अपनाया,
पर मन ने बनवास स्वयं ओढ़ लिया,
हर दीप, हर पूजा में उनका नाम जपा
क्या यही कम था, जो मैंने किया?
शब्दों की सीमाएँ मेरी कथा चुराती रहीं,
इतिहास की दृष्टि मुझे अनदेखा करती रही,
पर एक स्त्री जानती है दूसरी का मौन
वही मौन अब बना मेरा स्वर,
मेरी पहचान।
— सविता सिंह मीरा
