ग़ज़ल
मेरे जगने सोने से अब फर्क नहीं पड़ता,
मेरे हँसने रोने से अब फर्क नहीं पड़ता।
सोचना समझना छोड़ दिया है मैंने भी,
मेरे होने न होने से अब फर्क नहीं पड़ता।
मिल गया था मैं बिन मांगे जिन्हें यहाँ,
उन्हें मेरे खोने से अब फर्क नही पड़ता।
मैंने भी दिल को पत्थर बना लिया है,
तन्हा कोने का अब फर्क नहीं पड़ता।
“विकास” को समझते रहे सब खिलौना,
टूटे हुए खिलौने से अब फर्क नही पड़ता।
— डॉ. विकास शर्मा
