कहानी – स्मृतियों के साए
सुरजीत एक हफ्ते की छुट्टी काटकर वापस ड्यूटी पर जा रहा था। सुबह आठ बजे घर से चला था और इस समय जब वह यहां चमेरा बस स्टैंड पर बस से उतरा तो तीन बज गए थे। रास्ता तो कोई चार घंटे का था। परंतु उस जमाने में बसें बड़ी देर के बाद चलती थीं । आज की तरह न तो इतनी ज्यादा बसें हुआ करती थी और न ही सड़कों की हालत अच्छी थी। सिंगल रोड़ हुआ करते थे। ड्राइवर बड़ी सावधानी व आराम से चलते थे। सिंगल रोड होने के कारण दुर्घटनाओं के ज्यादा चांस होते थे। इसलिए ड्राइवर ड्राइविंग करते हुए बड़े सतर्क रहते थे। आज जिस सफर को करने में दो घंटे लगते हैं तब तीन साढ़े तीन घंटे लगते थे। इसलिए चार घंटे के रास्ते को तय करने के लिए सात घंटे लग गए थे। यहां पहाड़ में तब प्राइवेट बसें नहीं चलती थीं । सिर्फ एच आर टी सी की बसें ही चलती थीं । बसें कम होने के कारण कई रूटों पर दिन में दो-तीन बसें ही चलती थीं। एक बस छूट गई तो दूसरी बस के लिए दो-तीन घंटे का इंतजार करना पड़ता था । यह अस्सी-नब्बे के दशक की बात है।
वह बस से उतरा और सामने दुकान से सिगरेट की डिबिया ली और फिर पीठ पर बैग उठाए पहाड़ की चढ़ाई पर चल पड़ा। जून का महीना था। दोपहर होने लगी थी परंतु धूप बहुत तेज थी । चढ़ाई यहीं से शुरू होती थी। दरिया के किनारे सड़क से पहाड़ की चोटी तक लगभग 9 किलोमीटर की खड़ी सीधी चढ़ाई का रास्ता था।
इस चढ़ाई को तय करने में तीन से चार घंटे लग जाते थे। बिलकुल खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए थोड़ी-थोड़ी दूर बाद विश्राम के लिए रुकना पड़ता था।
इस चढ़ाई को सामान के साथ चढ़ना तो और भी मुश्किल हो जाता था । परंतु नौकरी थी और जवानी के दिन भी थे ।
इस सीधी तीखी चढ़ाई से डर नहीं लगता था।
पहाड़ भी कदमों में झुका सा लगता था, कोई परवाह नहीं ।जवानी के दिन ऐसे ही होते हैं।रोमांच और जोश से लबरेज।
बड़ी से बड़ी चट्टानों को फांदकर आदमी आगे निकल जाता है..।
थोड़ी दूर चलने के बाद नाले की बगल में पेड़ की छाया थी। वह वहां चट्टान पर थोड़ी देर आराम करने के लिए बैठ गया।उसने पेंटी की जेब से सिगरेट निकाला और सुलगा लिया । सिगरेट की डिबिया पर वैधानिक चेतावनी पढ़ी , लिखा था-” सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” पढ़कर मुस्कुराया।
उसकी तरह न जाने कितने ही लोग सिगरेट सुलगाते हुए इस वैधानिक चेतावनी को पढ़ते होंगे। परंतु…?
फिर इस वैधानिक चेतावनी को नजर अंदाज करके सिगरेट सुलगा ही लेते हैं । जैसे उसने सुलगा लिया था।
यह अमल कभी छूटता नहीं ।
नशे का दलदल ऐसा ही होता है ।
आदमी सब कुछ जानता है परंतु एक बार गिरने के बाद निकलना बहुत मुश्किल होता है।
परंतु फिर भी संभावनाएं हमेशा जिंदा रहती हैं कोई निकलना चाहे तो इतना मुश्किल भी नहीं।
बस इच्छाशक्ति होनी चाहिए । फिर कोई काम मुश्किल नहीं।
उसने भी तो अपने कलीग के कहने पर पहले एक एक कश लगाना शुरु किया था और फिर धीरे धीरे एक सिगरेट पर जा पहुंचा।
उसके बाद पीने की केपेसिटी भी बढ़ती गई और डिबियां भी। उसने गिनती की तो आज यह उसका सातवां पैकेट था दिन का जो उसने अब यहां खरीदा था।
अभी तो तीन बजे थे शाम तक खत्म हो जाना था और हो सकता है एक पैकेट और लेना पड़े।
आज पहली बार वह अपनी महीने की सैलरी और खर्चे का हिसाब किताब लगाने लगा ।
उस समय साढ़े तीन रुपए में फोर स्केयर का एक पैकेट मिलता था। उसने सात पैकेट का टोटल किया तो साढ़े चौबीस रुपए बने और महीने के सा्त सौ बीस के लगभग।
उसने अपने अकेले के लिए एक किलो दूध लगवाया था ₹5 किलो के हिसाब से। शाम तक एक किलो दूध खत्म हो जाता था चाय में ही।
रात को उसे पीने के लिए एक गिलास तक नहीं बचता था। सारा दिन उसके क्वार्टर में रौनकें लगी रहती थीं। एक गया तो दूसरा आ गया दूसरा गया तो तीसरा..।
खर्चा तो फिर होना ही था।
उसने सारे सामान का हिसाब लगाया तो जितनी उसकी सैलरी बनती थी उतना ही खर्चा बन रहा था।
उसने इस तरह पहली बार अपनी आय व्यय का हिसाब किताब किया था । वरना उसका पूरा वेतन कहां जाता है उसने कभी हिसाब नहीं लगाया।
आज उसने पहली बार पैसे की वैल्यू का हिसाब लगाया था।
उसे लगा था इस तरह तो सारा वेतन उसका खाने पीने में ही खत्म हो जाएगा। फिर इतने दूर पहाड़ पर जाकर नौकरी करने का क्या औचित्य? घर में पत्नी बेटी व माता-पिता चार लोग उसके इसी वेतन पर निर्भर थे।
उसने सोचा इससे तो बेहतर था घर में ही रहा जाता और वह भीतर ही भीतर उद्विग्न हो उठा था।
परंतु इस सीखे हुए नशे और चादर के बाहर फैलाई हुई टांगों को इतनी जल्दी संतुलन में लाना आसान भी नहीं था।
अब उसने निश्चय किया कि सिगरेट थोड़ा कम कर देंगे और बीड़ी पीना शुरु कर देंगे।
ताकि थोड़ा बजट ठीक किया जा सके। फिर उसने अपने क्वार्टर का जो एक्स्ट्रा खर्चा था उसे भी कम करने का निश्चय किया।
अब उसने भीतर ही भीतर खुद से वादा किया था कि अपने पैर अपनी चादर से बाहर नहीं जाने दूंगा।
परंतु कोई भी काम इतना आसान तो होता नहीं है जितना आदमी आसान समझता है।
फिर भी दृढ़ निश्चय और विश्वास भरे विचार ही किसी भी काम की सफलता के मूल में रहते हैं।
बिना विचार के कोई भी काम नहीं किया जा सकता।
हर कार्य के पीछे विचार छाया की तरह खड़ा रहता है।
वह सोच रहा था जब कॉलेज में इस तरह नशे सीखने की उम्र थी तब तो नशे के साथ हाथ नहीं लगाया और अब जब वह दौर निकल गया है तो वह किस दलदल में जा धंसा है?
यह सब संगत का असर था। उसके कलीग ने ही जैसे उसे उंगली पकड़कर दलदल पर लाकर खड़ा कर दिया था।
वह सब कुछ जानते हुए भी जैसे बेबस था।
अब उस दलदल का आकर्षण उसे आनंदित करता था। इस दौरान उसे चरस पीने का भी चस्का लग गया था।
पहले पहले तो वह शाम को उसके साथ पी लेता था परंतु धीरे-धीरे उसने सुबह ही अकेले पीनी शुरु कर दी थी।
उस चट्टान पर बैठे हुए आज पहली बार उसे जैसे ज्ञान हो रहा था। यह कोई दैवीय कृपा थी या पुरखों का आशीष…,
आज पहली बार उसने नशे की इस दलदल के आकर्षक से वितृष्णा महसूस की थी।
अब तक धूप थोड़ा ढल आई थी। गर्मी भी थोड़ी कम हो गई थी। विश्राम भी हो गया था अब उसने अपना बैग फिर पीठ पर उठाया और चल पड़ा।
वितृष्णा और आकर्षण का यह खेल भीतर चलता रहा।
कभी वितृष्णा जीत जाती तो कभी आकर्षण।
अब उसने अपने पैर भी चादर के भीतर समेटने शुरू कर दिए थे।
उसके रोज के साथी उसके इस बदलाव को कई नाम दे रहे थे। परंतु उसे अब किसी के कुछ भी कहने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा था।उस पर तो इस नशे के दलदल से निकलने की धुन सवार थी।
इस तरह पांच छः महीने और बीत गए उसे आकर्षण और वितृष्णा के पेंडुलम पर झूलते हुए।
वह शाम को स्मोकिंग बंद कर देता और दूसरे दिन जब बहुत तलब उठती तो फिर पी लेता।
इस तरह से उसने कई बार खुद को आजमाया परंतु हर बार वह इस लत के आगे घुटने टेक देता।
सही भी था कि एक चेन स्मोकर जो दिन के सात पैकेट फूंक देता था कैसे एक दिन में छोड़ दे।
उसकी नन्ही बेटी ढाई साल की हो गई थी।
एक दिन एक घटना घट गई। शायद यह उसके लिए ईश्वरीय वरदान ही था।
यह वरदान कोई और नहीं ईश्वर जैसे स्वयं बेटी के मुंह से उसे दे रहा था।
आज होली की छुट्टी थी।
पत्नी व बेटी उसके साथ ही थीं। कुछ दिन पहले ही वे घर से उसके पास आई थीं।
अन्यथा वह यहां अकेला ही रहता था। फिर अपनी मर्जी जो मन आया वह करता था। क्योंकि पूछने वाला तो कोई होता नहीं था । कोई बंदिश नहीं थी। इसलिए उन्मुक्त परिंदा बनकर जहां दिल किया वहां उड़ जाया करता था।
जीवन में बंदिशें भी बहुत जरूरी होती हैं वरना जीवन उच्छृंखल हो जाता है ।
कोई पूछने वाला न हो तो आदमी की फितरत है वह आवारगी चुन लेता है जैसे उसने चुन ली थी।
यह सब उसके अकेलेपन की आवारगी और संगत का असर था कि वह नशे की दलदल में जा घुसा था।
जून से वह इस भीतरी युद्ध को लड़ रहा था , अब मार्च आ गया था।
इस दौरान उसने कई बार कोशिश की थी परंतु हर बार नाकाम रहा। एक दिन छोड़ता तो दूसरे दिन फिर शुरू कर देता।
जहां वह रहता था पहाड़ का एक छोटा सा गांव था। चार-पांच घर और सामने बर्फीले पहाड़। बारह महीने ठंड। जून में भी गर्म पानी से नहाना पड़ता। लोग सर्दियां आने से पहले लकड़ियां इकट्ठी कर लेते थे। अप्रैल मई तक ठंड का मौसम रहता था।
ठंडे पानी से नहाना तो बहुत ही मुश्किल काम था।
पत्नी पानी गर्म करके नहाने चली गई थी और वह बेटी के साथ खेल रहा था। जैसे ही बेटी को गोद में उठाया तो वह अपनी मीठी जुबान में बोली-“पापा आप गंदे हो बीड़ी पीते हो…।”
बच्चे भी ईश्वर का रूप होते हैं।
आज उसे पहली बार लगा था कि यह सचमुच गंदी चीज़ है,उसका बच्चा भी उसे गंदा कह रहा है। दुनिया तो कहती ही होगी। इस बात पर उसने कभी विचार नहीं किया था।
ऐसा लगा कि उसका बच्चा उसे इस लत से हटने के लिए ही कह रहा है…।
यह तो उसके बच्चे को भी पसंद नहीं है।
अब उसका मन और भी मजबूती के साथ इस आकर्षण से वितृष्णा की ओर भागने लगा था।
आज होली का दिन था। उस जमाने में पहाड़ी गांवों में होली खेलने का रिवाज तो नहीं था परंतु यह रिवाज था कि अंधेरा होते होते होली के दिन गांव के लोग घास फूस इकट्ठा करके एक जगह होली जलाते थे।
मक्की के दाने और सयूल के दाने भूनकर ले जाते थे और जलती हुई आग में आहुति देते थे ।
उस जली हुई आग को सभी लोग लांघते थे। ऐसी धारणा थी कि होली की आग को लांघने से फोड़े फुंसियां नहीं होते। आग का पूजन इसलिए भी किया जाता था कि होली के बाद गर्मी का आगाज हो जाता है।
वह आंगन से देख रहा था उसके आसपास आठ दस गांव जो उसे नजर आ रहे थे सब में लोग होली जला रहे थे।
वह आज सुबह से ही वितृष्णा के पाले में खड़ा था। उसके मन में आया क्यों न मैं इस इस मौके पर अपनी इस बुराई को त्याग दूं जिसे उसकी बेटी भी पसंद नहीं करती है।
फिर क्या था…?
उसने अपना सिगरेट का पैकेट और बीड़ी का पैकेट निकाला और तोड़ ताड़ कर माचिस लगाकर जला दिया।
पास खड़े उसके मकान मालिक ने कहा-” यह क्या कर रहे हो? नहीं पीने हैं तो हमें दे देते जला क्यों रहे हो ?”
उसने कहा-” मैं खुद भी इस बुराई को छोड़ रहा हूं, यह बुरी चीज आपको नहीं दे सकता।”
मकान मालिक ने हंसते हुए कहा-” कोई बात नहीं सुबह देख लेंगे।”
मकान मालिक को उम्मीद थी कि वह फिर सुबह जब तलब लगेगी तो फिर पी लेगा।
क्योंकि मकान मालिक ने पहले कई बार उसे सिगरेट छोड़ने हुए और फिर पीते हुए देखा था।
परंतु अब उसे अपनी इच्छा शक्ति पर विश्वास था। अब उसने खुद को उस आकर्षक से मुक्त कर लिया था।
वह खुश था कि वह भटके हुए अंधेरे रास्ते से फिर उजाले भरे रास्ते की ओर आ गया है।
सिगरेट की होली जलाने के बाद कई दिनों तक उसे सिगरेट की तलब परेशान करती रही। परंतु उसकी इच्छा शक्ति के आगे तलब ने भी धीरे-धीरे घुटने टेक दिए और वह जीत गया…., जैसे कोई युद्ध जीत जाता है।
तीन दशक पहले की यह कहानी भी कितनी दिलचस्प थी।
अंधेरे से उजाले की कहानी….।
आकर्षण से वितृष्णा की कहानी….।
दृढ़ इच्छा शक्ति की जीत की कहानी…।
कहते हैं न अतीत कितना भी कड़वा हो उसकी स्मृतियां हमेशा मीठी हुआ करती हैं।
अभी वह अतीत की स्मृतियों के साए में ही था कि स्कूल में छुट्टी की घंटी बज गई। घंटी के बजते ही वह स्मृतियों के साए से ऐसे बाहर आ गया मानो गहरी नींद से जाग गया हो । उसने अपना बैग उठाया और लाइब्रेरी का दरवाजा बंद करके प्रिंसिपल कार्यालय की तरफ चल पड़ा अटेंडेंस लगाने…।
— अशोक दर्द
