मेरी डायरी के पन्ने
मेरी डायरी के ये धूल-धूसरित, उदास पन्ने और उनकी हर पंक्ति में सांस लेती तुम्हारी स्मृतियां…
आज फिर मैंने इन्हें पलटा, तो लगा जैसे बीते हुए कल का कोई घाव फिर से हरा हो गया हो।
मुझे इस वास्तविकता से भला कब अस्वीकार रहा है कि तुम कभी मेरी धड़कनों की लय, मेरी नाड़ियों की गति और मेरी सांसों का संगीत बन चुके थे। उन दिनों—जब समय हमारी मुट्ठी में था—मैं किस तीव्रता, किस दीवानगी से तुम्हारे प्रेम में डूबा रहता था, इसका साक्षी मेरा ईश्वर है। तुम मेरे भावों पर, मेरी सोच पर, मेरी सुबह और मेरी शाम पर इस तरह छाए रहते थे कि मुझे अपने अस्तित्व तक का होश न था। मैं तो उन स्वर्णिम क्षणों को, तुम्हारी उन तीखी कटीली दृष्टियों को और बातों के उस सिलसिले को चाह कर भी भुला न सका।
मगर मुझे तुमसे एक शिकायत है, एक गहरी व्यथा है… क्या तुमने उन तमाम सुंदर क्षणों को इतनी निष्ठुरता और सरलता से भुला दिया? क्या तुम्हारे हृदय के किसी कोने में उस बीते समय की कोई टीस शेष नहीं रही? तुम्हारे बिना मेरी यह जिंदगी आज भी एक निरंतर मौन, एक गहरे सन्नाटे और असीम अकेलेपन का निवास बनी हुई है। समय ठहर सा गया है, और यह अधूरापन अब शायद जीवनभर कभी पूर्ण न हो सकेगा।
मैं आज भी, जीवन के इस मोड़ पर भी, हृदय की अगाध गहराइयों से तुम्हें उसी तीव्रता से चाहता हूँ। प्रेम कम नहीं हुआ, बल्कि समय के साथ इसकी तड़प और बढ़ गई है। कभी-कभी जब रात का सन्नाटा गहराता है और अकेलापन सीमा से बढ़ने लगता है, तो मेरे सूने हृदय में तुम्हारा विचार अंगड़ाई लेता है। पहले तो तुम्हारी स्मृतियों की वह ओस जैसी ठंडक मेरे मस्तिष्क को अपने आगोश में लेकर एक संतोष का आभास दिलाती है, मगर अगले ही क्षण वह ठंडक विरह की सुलगती हुई आंच बन जाती है, जो मेरे अस्तित्व को, मेरी आत्मा को भीतर तक क्षत-विक्षत कर देती है। यह वियोग का दुख वो विष है जिसे मैं रोज बूंद-बूंद पीता हूँ।
मैं इस वास्तविकता से भी परिचित हूँ कि जीवन स्वप्नों की सेज नहीं, बल्कि एक कठिन मार्ग है। यह एक ऐसी निष्ठुर सच्चाई है जहां पग-पग पर समस्याओं और संसार के बंधनों का सामना करना पड़ता है। इन संकटों से, संसार के तानों से न तो आंखें चुराई जा सकती हैं और न ही इन से भागना संभव है। यह सत्य है कि तुम्हें पाना मात्र एक स्वप्न था, एक ऐसी अभिलाषा थी जो कभी पूरी न हो सकी। लेकिन न जाने क्यों, इस दिल की हठ और इन स्वप्नों की सार्थकता मुझे तुम्हारे प्रेम के घेरे से स्वतंत्र होने ही नहीं देतीं। मैं आज भी उसी बंधन में प्रसन्न हूँ।
देखो न! समय कितनी बेरहमी से रेत की तरह हाथों से फिसल गया। आज जब मैं दर्पण के सामने खड़ा होता हूँ, तो कनपटी पर चांदी के तार (सफेद बाल) साफ उभरकर दिखाई देते हैं। यह ढलती आयु, ये श्वेत होते बाल चीख-चीख कर कह रहे हैं कि वर्तमान बदल चुका है, यौवन का वो दौर बीत चुका है। मगर इस दिल के पागलपन की स्थिति तो देखो! तुम्हारा मुखमंडल आज भी मेरी कल्पना के दर्पण में उतना ही प्रफुल्लित, उतना ही ताजा और सुंदर दिखाई देता है, जैसे तुम आज भी हाथों में पुस्तकें थामे, वही शालीनता ओढ़े महाविद्यालय के लिए निकलने वाली हो। समय ठहर गया है तुम्हारे चेहरे पर, और मैं वृद्ध हो रहा हूँ तुम्हारी स्मृति में।
कष्ट! अत्यंत कष्ट! कि अब तुम्हारी एक झलक भी मुझे सुलभ नहीं। भाग्य ने हमें इस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां हम एक ही आकाश के नीचे रहकर भी एक-दूसरे के लिए अपरिचित हैं। हे ईश्वर! इस सीने में किस कदर संताप, कितनी घुटन और वेदना की नदियाँ उमड़ रही हैं, मैं व्यक्त नहीं कर सकता। मैं तो इस भ्रम में जी रहा था कि संसार के सारे कठिन चरणों को, धर्म और समाज की तमाम दीवारों को पार करके अंततः एक दिन तुम्हें पा ही लूंगा। पर मेरी सारी आशाएं, सारे दावे इस वियोग के बवंडर में बिखर गए।
मेरा अस्तित्व अब एक शांत खंडहर की भांति है। इस दशा को देखकर संसार ने मुझे ‘पागल’ की उपाधि दे दी है, लोग मुझे विक्षिप्त और सनकी घोषित कर चुके हैं। भला वो क्यों न कहें? हां, मैं आम सभा में स्वीकार करता हूँ कि मैं पागल हूँ! मैं तुम्हारे प्रेम में भरे बाजार बदनाम हूँ और मुझे अपनी इस बदनामी पर गर्व है। मुझे अब इस नश्वर संसार से, इन मनुष्यों से कुछ नहीं चाहिए। मेरी अंतिम इच्छा, मेरे जीवन की कुल संचित पूंजी बस इतनी है कि प्रलय तक (सदा के लिए) लोग मुझे तेरे नाम के संदर्भ से पहचानें। जब भी मेरा वर्णन आए, लोग कहें कि यह वही है जो उसके प्रेम में सर्वस्व खो बैठा। यही मेरे प्रेम की पराकाष्ठा होगी, यही मेरी सफलता होगी।
मेरे सहयात्री! जीवन के इस जटिल और अंधकारमय मार्ग पर साथ चलते-चलते तुम न जाने किस मोड़ पर मुझसे ओझल हो गए। मैं आज भी उसी पुराने चौराहे पर, तुम्हारे प्रतीक्षा का दीपक जलाए अकेला और स्तब्ध खड़ा हूँ। वायु की हर सरसराहट, द्वार पर होती हर हल्की सी आहट पर दिल धड़क उठता है और तुम्हारे ही आने का आभास होता है। आँखें तरस गई हैं तुम्हें देखने को। काश! मैं इस निष्ठुर संसार की तरह तुम्हें भूल पाता… मगर ये संभव नहीं, यह मेरे वश में नहीं।
क्या हमारी कहानी समाप्त हो गई? नहीं, कदापि नहीं! शरीर नष्ट हो सकते हैं, समय बदल सकता है, लेकिन हमारी प्रेम-गाथा कभी समाप्त नहीं हो सकती। किसी कवि ने विरह और निष्ठा के इसी भाव को क्या सुंदर शब्द दिए हैं,
केवल तुम्हारा, अंतिम सांस तक…
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
