ग़ज़ल
जब उसने तय कर रखा है किसको कब ले जाना है
जाना सबको ही पड़ता है उसका हर खेल पुराना है
बिना बताए बिन कुछ बोले भेज रहा है अपनी पाती
और जब आ जाती है पाती चलता तो नहीं बहाना है
किसको कितने दिन रुकना है पहले से तय होता है
प्राण कहां से कब निकलेंगे यह सच नहीं बताना है
कितनी सांस कौन जियेगा और मौत कब आएगी
कोई ज्ञानी जान ना पाया फिर काहे का पछताना है
आने का समय है तय सबका बस जाने का पता नहीं
समझो यह कड़वा सच है दुनिया तो मुसाफिरखाना है
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
