गीत
विदेशों में देश को नीचा दिखाये
पकड़ लो साथी, जाने न पाये
इधर उधर की बकवास करता
क्या बक रहा है न खुद भी समझता
रह-रह के वो अपनी बाँहें चढ़ाये
पकड़ लो साथी, जाने न पाये
संसद में नित्य नया रूप धारे
कभी चूमा चाटी, कभी आँख मारे
कभी ज़बर्दस्ती गले पड़ जाये
पकड़ लो साथी, जाने न पाये
विदेशों में जाकर षड्यंत्र रचता
वापस आकर उसको चलाता
नित्य नई टूलकिट वो बनाये
पकड़ लो साथी, जाने न पाये
बातें हैं इसकी सब पागलों सी
कुछ भी समझ में न आये किसी की
चमचों से अपना एजेंडा चलाये
पकड़ लो साथी, जाने न पाये
— बीजू ब्रजवासी
माघ शु. १०, सं. २०८२ वि. (२८ जनवरी, २०२६)
