मुक्तक
दौड़ा भागी करती रहती थकती कब है दीवानी।
चलती रहती व्यवधानों संग रुकती कब है दीवानी।
संग हवा का मिल जाए तो हो जाती बागी अनहद,
अठखेली कर उड़ी नदी इक, थमती कब है दीवानी।
— गुंजन अग्रवाल अनहद
दौड़ा भागी करती रहती थकती कब है दीवानी।
चलती रहती व्यवधानों संग रुकती कब है दीवानी।
संग हवा का मिल जाए तो हो जाती बागी अनहद,
अठखेली कर उड़ी नदी इक, थमती कब है दीवानी।
— गुंजन अग्रवाल अनहद