कदाचित् मैं सृष्टा की कली हूँ!
कदाचित् मैं सृष्टा की कली हूँ,
खिली खिलखिलाई ख़ुशबू दी हूँ;
भ्रमरों को प्राणें का पराग दी हूँ,
कालांतर में धरा धूल से मिली हूँ!
मेरा सुहास सुबास आज भी वहाँ है,
सुगंध का अट्टहास परिवेश में भरा है;
संततियों को वह साहस दिया है,
विसंगतियों को वो विलुप्त किया है!
जो तितलियाँ मुझे चूम सिहर गईं,
कुछ काल कला दिखा सिधा गईं;
मेरी स्मृति विधा विद्या सुधा गईं,
अगले जीवन पड़ाव में फिर मिल गईं!
जो कवि मुझे देख कविता लिख गए,
मेरा माधुर्य जगत् में बिखरा गए;
जो राग रागिनी उर उड़ेले गा गए,
विधाता की अभिव्यक्ति कर गए!
वे मुझे मेरे रचयिता से मिला गए,
आनन्द अनुभूतियों में भव गए;
अपनी पंखुड़ियों के संस्पर्श से सृजित मकरंद को,
आज मैं त्राण भरे ‘मधु’ प्राण में चखी हूँ!
— गोपाल बघेल ‘मधु’
