किराए के घर में गुमान
सर्द हवाओं में
कदम ढूँढते दीवारें
गुमान छुपा बैठा
खिड़कियों के साये
सपनों की मूरत टूटती
खामोशी गाती
पुराने फर्श की छाँव
यादों के रंग फीके
अजनबी मुस्कान
छत की दरारों में
सूरज की किरण ढलती
गुमान बिखरता
दीवारों की नमी
कहानी सुनाती है धीरे
अतीत का साया
कमरे का कोना
सुनता है मौन गीत
मन की पीड़ा
खिड़की पर बैठकर
हवा को गले लगाना
स्वप्न फिर उड़ते
रात का अँधेरा
किराए के घर में भी
आशा जगाता
दीवारों की फुसफुसाहट
अनकही बातों में लिपटी
गुमान मुस्कुराए
फर्श के क़दमों में
छुपा हुआ कल का डर
भविष्य की राह
छत की छाया में
सपनों की पतंगें खेलें
मन फिर हँसे
खिड़की से झाँकते
बाहर की दुनिया पूछे
क्यों मैं अन्दर
पानी की धारों में
साफ़ होते हैं कुछ लम्हे
गुमान भी ढलता
किराए के घर की
सुनसान गलियों में छुपा
सुकून मुस्कुराए
छोटे कमरों में
बड़ी उम्मीदें पलें
मन फिर जी उठे
रात की चुप्प
दीवारों में गूँजे
सपनों के गीत
दीवारों का रंग
सिर्फ़ साया नहीं
जीवन की झलक
साया गिरता धीरे
किराए के घर में भी
प्रेम की कली
सूरज की किरणें
अँधेरे को चीरतीं
गुमान रोशन
आवाज़ें कुछ कहें
भूत और वर्तमान में
मन की यात्रा
फर्श की ठंडी ठंडक
कदमों को थामे रखे
सपनों की ओर
छत पर खड़े होकर
हवा से बातें करें
गुमान बहता
खिड़की का पर्दा
कहता है कहानी नई
मन को छू जाए
किराए के घर में
छुपा हर गुमान भी
जीवन का हिस्सा
— डॉ. अशोक
