कविता

कविता

सूखे पत्ते का गिरना, नए की आस देता है,
पतझड़ महीना, बसंत का आगाज़ देता है।
होता है कोई खुदगर्ज़, नाशुक्रा जमाने में,
मतलब निकल गया, सबको भुला देता है।
देखें हैं इन्सान भी, हमने राहे जिंदगी में,
मानवता की राह पे, जो जान लुटा देता है।

— डॉ अ कीर्तिवर्धन